भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

जातकर्मप्रकरणम् ७१ ओम् शण्डामर्का उपवीरः शौण्डिकेय उलूखलः। मलिम्लुचो द्रोणासश्च्यवनो नश्यतादितः स्वाहा॥ इदं शण्डामर्काभ्यामुपवीराय शौण्डिकेयायोलूखलाय मलि- म्लुचाय द्रोणेभ्यश्च्यवनाय—इदन्न मम॥१॥ ओम् आलिखन्ननिमिषः किंवदन्त उपश्रुतिर्हर्यक्षः कुम्भी- शत्रुः पात्रपाणिर्नृमणिर्हन्त्रीमुखः सर्षपारुणश्च्यवनो नश्यतादितः स्वाहा॥ इदमालिखतेऽनिमिषाय किंवदन्द्या उपश्रुतये हर्यक्षाय कुम्भीशत्रवे पात्रपाणये नृमणये हन्त्रीमुखाय सर्षपारुणाय च्यवनाय—इदन्न मम॥२॥ इन मन्त्रों से १० दिन तक होम करके पश्चात् अच्छे- अच्छे विद्वान्, धार्मिक, वैदिक मत वाले बाहर खड़े रहकर और बालक का पिता भीतर रहकर आशीर्वादरूपी नीचे लिखे मन्त्रों का पाठ आनन्दित होके करें— मा नौ॑ हासिषु॒र्ऋष॑यो॒ दैव्या॒ ये त॑नू॒पा ये न॑स्त॒न्वऽस्तनू॒जाः। अम॑र्त्या॒ मर्त्या॑ँअ॒भि नः॒ सच॑ध्व॒मायु॑र्धत्त॒ प्रतरं॒ जीव॑सै नः॥१॥ —अथर्व० कां० ६। अनु० ४। सू० ४१॥ इ॒मं जी॒वेभ्यः॑ परि॒धिं द॑धामि॒ मैषां॒ नु गा॒दप॑रो॒ अर्थ॑मे॒तम्। श॒तं जीव॑न्तः श॒रदः॑ पु॒रूची॒स्तिरो मृ॒त्युं द॑धतां॒ पर्व॑तेन॥२॥ —अथर्व० कां० १२। अनु० २। मं० २३॥ वि॒स्वाँन्नो॒ अभ॑यं कृणोतु॒ यः सु॒त्रामा॑ जी॒रदा॑नुः सु॒दानु॑ः। इ॒हेमे वी॒रा ब॒हवो॑ भवन्तु॒ गोम॒दश्व॑व॒न्मय्य॑स्तु पु॒ष्टम्॥३॥ —अथर्व० कां० १८। अनु० ३। मं० ६१॥ ॥ इति जातकर्मसंस्कारविधिः समाप्तः ॥