भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

अथ निष्क्रमणसंस्कारविधिं वक्ष्यामः 'निष्क्रमण' संस्कार उसको कहते हैं कि जो बालक को घर से जहाँ का वायु, स्थान शुद्ध हो, वहाँ भ्रमण कराना होता है। उसका समय जब अच्छा देखें तभी बालक को बाहर घुमावें। अथवा चौथे मास में तो अवश्य भ्रमण करावें। इसमें प्रमाण— चतुर्थे मासि निष्क्रमणिका सूर्यमुदीक्षयति-तच्चक्षुरिति ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥ जननाद्यस्तृतीयो ज्योत्स्नस्तस्य तृतीयायाम् ॥ —यह पारस्करगृह्यसूत्र में भी है॥ अर्थः—निष्क्रमण-संस्कार के काल के दो भेद हैं—एक बालक के जन्म के पश्चात् तीसरे शुक्लपक्ष की तृतीया और दूसरा चौथे महीने में जिस तिथि में बालक का जन्म हुआ हो उस तिथि में यह संस्कार करे। उस संस्कार के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात् बालक को शुद्ध जल से स्नान करा, शुद्ध-सुन्दर वस्त्र पहनावे। पश्चात् बालक को यज्ञशाला में बालक की माता ले-आके पति के दक्षिण पार्श्व में होकर पति के सामने आकर बालक का मस्तक उत्तर और छाती ऊपर अर्थात् चित्ता रखके पति के हाथ में देवे, पुनः पति के पीछे की ओर घूमके बाएँ पार्श्व में पूर्वाभिमुख बैठे। ओं यत्ते सुसीमे हृदयँ हितमन्तः प्रजापतौ। वेदाहं मन्ये तद् ब्रह्म माहं पौत्रमघं निगाम् ॥ १ ॥ ओं यत् पृथिव्या अनामृतं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्। वेदामृतस्याहं नाम माहं पौत्रमघँ रिषम् ॥ २ ॥