संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ संस्कारविधिः ओम् इन्द्राग्नी शर्म यच्छतं प्रजायै मे प्रजापती। यथायं न प्रमीयेत पुत्रो जनित्र्या अधि॥३॥ इन तीन मन्त्रों से परमेश्वर की आराधना करके पृष्ठ ९- ३४ में लिखे प्रमाणे परमेश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण आदि और सामान्यप्रकरणोक्त समस्त विधि कर और पुत्र को देखके इन निम्नलिखित तीन मन्त्रों से पुत्र के शिर का स्पर्श करे— ओम् अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥ १ ॥ ओं प्रजापतेष्ट्वा हिङ्कारेणावजिघ्रामि । सहस्रायुषाऽसौ जीव शरदः शतम् ॥ २ ॥ गवां त्वा हिङ्कारेणावजिघ्रामि । सहस्रायुषाऽसौ जीव शरदः शतम् ॥ ३ ॥ तथा निम्नलिखित मन्त्र बालक के दक्षिण कान में जपे— अ॒स्मे प्र य॑न्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य॒ भूरेंः। अ॒स्मे श॒तः श॒रदो॑ जी॒वसै॑ धा अ॒स्मे वी॒राञ्छश्व॑त इन्द्र शिप्रिन्॥ १ ॥ इन्द्र॑ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि चित्तिं॒ दक्ष॑स्य सुभग॒त्वम॒स्मे। पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं त॒नूनां॑ स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः सु॑दि॒नत्वमह्नाम्॥ २ ॥ इस मन्त्र को वाम कान में जपके पत्नी की गोद में उत्तर दिशा में शिर और दक्षिण दिशा में पग करके बालक को देवे और मौन करके स्त्री के शिर का स्पर्श करे। तत्पश्चात् आनन्दपूर्वक उठके बालक को सूर्य का दर्शन करावे और निम्नलिखित मन्त्र वहाँ बोले—