संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिष्क्रमणप्रकरणम् ७९ ओं तच्चक्षु॑र्देवहि॑तं पुरस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तः॑ शृणुयाम श॒रदः॑ श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥ इस मन्त्र को बोलके थोड़ा-सा शुद्ध वायु में भ्रमण कराके यज्ञशाला में लावे। सब लोग— “त्वं जीव शरदः शतं वर्धमानः”॥ इस वचन को बोलके आशीर्वाद देवें। तत्पश्चात् बालक के माता और पिता संस्कार में आये हुए स्त्रियों और पुरुषों का यथायोग्य सत्कार करके विदा करें। तत्पश्चात् जब रात्रि में चन्द्रमा प्रकाशमान हो, तब बालक की माता लड़के को शुद्ध वस्त्र पहना दहिनी ओर से आगे आके पिता के हाथ में बालक को उत्तर की ओर शिर और दक्षिण की ओर पग करके देवे और बालक की माता दाहिनी ओर से लौटकर बाईं ओर आ, जल की अञ्जलि भरके चन्द्रमा के सम्मुख खड़ी रहके— ओं यददश्चन्द्रमसि कृष्णं पृथिव्या हृदयग्॑ श्रितम्। तदहं विद्वाग्॑स्तत् पश्यन् माहं पौत्रमघग्॑ रुदम्॥ इस मन्त्र से परमात्मा की स्तुति करके जल को पृथिवी पर छोड़ देवे। तत्पश्चात् बालक की माता पुनः पति के पृष्ठ की ओर से पति के दाहिने पार्श्व से सम्मुख आके पति से पुत्र को लेके पुनः पति के पीछे होकर बाईं ओर आ बालक का उत्तर की ओर शिर दक्षिण की ओर पग रखके खड़ी रहे और बालक का पिता जल की अञ्जलि भर (ओम् यददश्च०) इसी मन्त्र से परमेश्वर की प्रार्थना करके जल को पृथिवी पर छोड़के दोनों प्रसन्न होकर घर में आवें। ॥ इति निष्क्रमणसंस्कारविधिः समाप्तः ॥