संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें8 अथ चूडाकर्मसंस्कारविधिं वक्ष्यामः यह आठवाँ संस्कार 'चूडाकर्म' है, जिसको केशछेदन- संस्कार भी कहते हैं। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का मत ऐसा है- तृतीये वर्षे चौलम् ॥ १ ॥ उत्तरतोऽग्नेर्व्रीहियवमाषतिलानां शरावाणि निदधाति ॥ २ ॥ इसी प्रकार पारस्करगृह्यसूत्रादि में भी है— सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् ॥ इसी प्रकार गोभिलीयगृह्यसूत्र का भी मत है॥ यह चूडाकर्म अर्थात् मुण्डन बालक के जन्म के तीसरे वर्ष वा एक वर्ष में करना। उत्तरायणकाल शुक्लपक्ष में जिस दिन आनन्द-मङ्गल हो, उस दिन यह संस्कार करे। विधि—आरम्भ में पृष्ठ ९-३४ में लिखित विधि करके चार शरावे ले, एक में चावल, दूसरे में यव, तीसरे में उर्द और चौथे शरावे में तिल भरके वेदी के उत्तर में धर देवे। धरके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे “ओम् अदितेऽनुमन्यस्व" इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीन बाजू और पृष्ठ २७ में लिखे प्रमाणे 'ओम् देव सवितः प्रसुव०' इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर जल छिटकाके, पूर्व पृष्ठ ३०-३२ में लिखित अग्न्याधान समिदाधान कर अग्नि को प्रदीप्त करके जो समिधा प्रदीप्त हुई हो उसपर लक्ष देकर पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे