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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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८६ संस्कारविधिः शरावा में अथवा उसके पास रक्खें। तत्पश्चात् इसी प्रकार— ओं येन धाता बृहस्पतेरग्नेरिन्द्रस्य चायुषेऽवपत्। तेन त आयुषे वपामि सुश्लोक्याय स्वस्तये॥ इस मन्त्र से दूसरी बार केश का समूह दूसरी ओर का काटके उसी प्रकार शरावा में रक्खे। तत्पश्चात्— ओं येन भूयश्च रात्र्यां ज्योक् च पश्याति सूर्यम्। तेन त आयुषे वपामि सुश्लोक्याय स्वस्तये॥ इस मन्त्र से तीसरी बार उसी प्रकार केशसमूह को काटके उपरि उक्त ३ [तीन] मन्त्रों—अर्थात् (ओं येनावपत्०), (ओं येन धाता०), (ओं येन भूयश्च०), और— ओं येन पूषा बृहस्पतेर्वायोरिन्द्रस्य चावपत्। तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवात्वे जीवनाय दीर्घायुष्ट्वाय वर्चसे॥ इस एक, इन चार मन्त्रों को बोलके चौथी बार इसी प्रकार केशों के समूह को काटे, अर्थात् प्रथम दक्षिण बाजू के केश काटने का विधि पूर्ण हुए पश्चात् बायीं ओर के केश काटने का विधि करे। तत्पश्चात् उसके पीछे आगे के केश काटे। परन्तु चौथी बार काटने में ‘‘येन पूषा०’’ इस मन्त्र के बदले— ओं येन भूरिश्चरादिवं ज्योक् च पश्चाद्वि सूर्यम्। तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवात्वे जीवनाय सुश्लोक्याय स्वस्तये॥ यह मन्त्र बोल चौथी बार केश छेदन करे। तत्पश्चात्— ओं त्र्या॒यु॒षं ज॒मद॑ग्ने॒ क॒श्यप॑स्य॒ त्र्या॒यु॒षम्। यद्दे॒वेषु॑ त्र्या॒यु॒षं तन्नो॑ऽअस्तु त्र्या॒यु॒षम्॥

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक) · पृष्ठ 90, कुल 318 में से · BharatKosha