संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचूड़ाकर्मप्रकरणम् ८५ ओम् ओषधे त्रायस्वैनम्॥ इस मन्त्र को बोलके तीन दर्भ लेके दाहिनी बाजू के केशों के समूह को हाथ से दबाके— ओं विष्णोर्दँष्ट्रोऽसि॥ इस मन्त्र से छुरे की ओर देखके— ओं शिवो नामा॑सि॒ स्वधि॑तिस्ते पि॒ता नर्म॑स्तेऽअस्तु॒ मा र्मा हिँग्ंसीः॥ इस मन्त्र को बोलके छुरे को दाहिने हाथ में लेवे। तत्पश्चात्— ओं स्वधिते मैनँ हिँग्सीः ॥ १ ॥ ओं निवर्त्तयाम्यायु॑षे॒ऽन्नाद्या॑य प्र॒जन॑नाय रा॒यस्पोषा॑य सु॒प्र॒जा॒स्त्वाय॑ सु॒वीर्या॑य ॥ २ ॥ इन दो मन्त्रों को बोलके उस छुरे और उन कुशाओं को केशों के समीप ले-जाके— ओं येनाव॑पत् सवि॒ता क्षुरेण॒ सोम॑स्य॒ राज्ञो॒ वरु॑णस्य वि॒द्वान्। तेन॑ ब्रह्माणो वप॒तेदम॒स्य गोमा॑न॒श्ववा॒नय॒मस्तु प्र॒जावा॑न्॥ —अथर्व० का० ६। सू० ६८॥ इस मन्त्र को बोलके कुशासहित उन केशों को काटे* और वे काटे हुए केश और दर्भ शमीवृक्ष के पत्रसहित, अर्थात् यहाँ शमीवृक्ष के पत्र भी प्रथम से रखने चाहिएँ, उन सबको लड़के का पिता और लड़के की माँ एक शरावे में रक्खें और कोई केश छेदन करते समय उड़ा हो, उसको गोबर से उठाके
- केश-छेदन की रीति ऐसी है कि दर्भ और केश दोनों युक्ति से पकड़कर अर्थात् दोनों ओर से पकड़के बीच में से केशों को छुरे से काटे। यदि छुरे के बदले कैंची से काटे तो भी ठीक है।