संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
३०८ संस्कारविधिः अपा॑गूहन्न॒मृतां॒ मर्त्ये॑भ्यः कृ॒त्वा सव॑र्णामदधुर्विव॑स्वते । उ॒ताश्वि-नाव॑भर॒द्यत्तदासी॒दज॑हादु द्वा मि॑थु॒ना सर॑ण्यूः स्वाहा॑ ॥ ९ ॥ इ॒मौ यु॑नज्मि ते॒ ब॒ह्नी असु॑नीताय॒ वोढ॑वे । ताभ्यां॑ य॒मस्य॒ साद॑नं॒ समि॑तीश्चाव॑ गच्छता॒त् स्वाहा॑ ॥ १० ॥ —अथर्व० का० १८ । सू० २ ॥ इन दश मन्त्रों से दश आहुति देकर— अग्नये रयिमते स्वाहा ॥ १ ॥ पुरुषस्य सयावर्यपेदघानि मृज्महे। यथा नो अत्र नापरः पुरा जरस आयति स्वाहा ॥ २ ॥ य एतस्य पथो गोप्तारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ३ ॥ य एतस्य पथो रक्षितारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ४ ॥ य एतस्य पथोऽभिरक्षितारस्तेभ्यः स्वाहा ॥ ५ ॥ ख्यात्रे स्वाहा ॥ ६ ॥ अपाख्यात्रे स्वाहा ॥ ७ ॥ अभिलालपते स्वाहा ॥ ८ ॥ अपलालपते स्वाहा ॥ ९ ॥ अग्नये कर्मकृते स्वाहा ॥ १० ॥ यमन्न नाधीमस्तस्मै स्वाहा ॥ ११ ॥ अग्नये वैश्वानराय सुवर्गाय लोकाय स्वाहा ॥ १२ ॥ आयातु देवः सुमनाभिरूतिभिर्यमो ह वेह प्रयताभिरक्ता । आसीदताँ सुप्रयते ह बर्हिष्यूर्जाय जात्यै मम शत्रुहत्यै स्वाहा ॥ १३ ॥ योऽस्य कोष्ठ्य जगतः पार्थिवस्यैक इदद्वशी । यमं भङ्गन्यश्रवो गाय यो राजाऽनपरोध्यः स्वाहा ॥ १४ ॥
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३०९ यमं गाय भङ्ग्यश्रवो यो राजाऽनपरोध्यः । येनाऽऽपो नद्यो धन्वानि येन द्यौः पृथिवी दृढा स्वाहा ॥ १५ ॥ हिरण्यकक्ष्यान्त्सुधुरान् हिरण्याक्षानयःशफान् । अश्वानानः शतो दानं यमो राजाभितिष्ठति स्वाहा ॥ १६ ॥ यमो दाधार पृथिवीं यमो विश्वमिदं जगत् । यमाय सर्वमित्तस्थे यत् प्राणद्वायुरक्षितं स्वाहा ॥ १७ ॥ यथा पञ्च यथा षड् यथा पञ्चदशर्षयः । यमं यो विद्यात् स ब्रूयाद्यथैक ऋषिर्विजानते स्वाहा ॥ १८ ॥ त्रिकद्रुकेभिः पतति षडुर्वीरेकमिद् बृहत् । गायत्री त्रिष्टुप्छन्दांसि सर्वा ता यम आहिता स्वाहा ॥ १९ ॥ अहरहर्नयमानो गामश्वं पुरुषं जगत् । वैवस्वतो न तृप्यति पञ्चभिर्मानवैर्यमः स्वाहा ॥ २० ॥ वैवस्वते विविच्यन्ते यमे राजनि ते जनाः । ये चेह सत्येनेच्छन्ते य उ चानृतवादिनः स्वाहा ॥ २१ ॥ ते राजन्निह विविच्यन्तेऽथा यन्ति त्वामुप । देवांश्च ये नमस्यन्ति ब्राह्मणांश्चापचित्यति स्वाहा ॥ २२ ॥ यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः संपिबते यमः । अत्रा नो विशपतिः पिता पुराणा अनुवेनति स्वाहा ॥ २३ ॥ उत्ते तभ्नोमि पृथिवीं त्वत्परीमं लोकं निदधन्मो अहँ रिषम् । एताथँ स्थूणां पितरो धारयन्तु तेऽत्रा यमः सादनात् ते मिनोतु स्वाहा ॥ २४ ॥ यथाऽहान्यनुपूर्वं भवन्ति यथर्तव ऋतुभिर्यन्ति क्लृप्ताः । यथा नःपूर्वमपरो जहात्येवा धातरायूथँषि कल्पयैषाथँ स्वाहा ॥ २५ ॥
३१० संस्कारविधिः न हि ते अग्ने तनुवै क्रूरं चकार मर्त्यः। कपिर्बभस्ति तेजनं पुनर्जरायुर्गौरिव। अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्। अप नः शोशुचदघं मृत्यवे स्वाहा॥ २६॥ —तैत्ति० प्रपा० ६। अनु० १।१०॥ इन छब्बीस आहुतियों को करके ये सब (ओम् अग्नये स्वाहा) इस मन्त्र से लेके (मृत्यवे स्वाहा) तक एकसौ इक्कीस आहुति हुईं, अर्थात् चार जनों की मिलके चार सौ चौरासी और जो दो जने आहुति देवें तो दो सौ बयालीस। यदि घृत विशेष हो तो पुनः इन्हीं एक सौ इक्कीस मन्त्रों से आहुति देते जाएँ, यावत् शरीर भस्म न हो जाए तावत् देवें। जब शरीर भस्म हो जावे पुनः सब जने वस्त्र प्रक्षालन, स्नान करके जिसके घर में मृत्यु हुआ हो उसके घर की मार्जन, लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके, पृष्ठ १३-२१ में लिखे प्रमाणे स्वस्तिवाचन शान्तिकरण का पाठ और पृष्ठ ९-१२ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना करके इन्हीं स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों से जहाँ अङ्क, अर्थात् मन्त्र पूरा हो, वहाँ ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण करके सुगन्ध्यादि मिले हुए घृत की आहुति घर में देवें कि जिससे मृतक का वायु घर से निकल जाए और शुद्ध वायु घर में प्रवेश करे और सबका चित्त प्रसन्न रहे। यदि उस दिन रात्रि हो जाए तो थोड़ी-सी आहुति देकर दूसरे दिन प्रातःकाल उसी प्रकार स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण के मन्त्रों से आहुति देवें। तत्पश्चात् जब तीसरा दिन हो तब मृतक का कोई सम्बन्धी श्मशान में जाकर चिता से अस्थि उठाके उस श्मशान भूमि में कहीं पृथक् रख देवे। बस, इसके आगे मृतक के लिए कुछ भी कर्म कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि पूर्व (भस्मान्तꣳ शरीरम्) यजुर्वेद
अन्त्येष्टिप्रकरणम् ३११ के मन्त्र के प्रमाण से स्पष्ट हो चुका है कि दाहकर्म और अस्थिसञ्चयन से पृथक् मृतक के लिए दूसरा कोई भी कर्म- कर्त्तव्य नहीं है। हाँ, यदि वह सम्पन्न हो तो अपने जीतेजी वा मरे पीछे उसके सम्बन्धी वेदविद्या, वेदोक्तकर्म का प्रचार, अनाथपालन, वेदोक्त धर्मोपदेश की प्रवृत्ति के लिए चाहे जितना धन प्रदान करें, बहुत अच्छी बात है॥ ॥ इति मृतक-संस्कारविधिः समाप्तः ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां श्रीयुतविरजानन्द- सरस्वतीस्वामिनां महाविदुषां शिष्यस्य वेदविहिताचारधर्म- निरूपकस्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनः कृतौ संस्कारविधिर्ग्रन्थः पूर्तिमगात्॥
आर्यसमाज के नियम १. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है। २. ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। ३. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना- पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। ४. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। ५. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिएँ। ६. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। ७. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए। ८. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए। ९. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए। १०. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें॥
० टकारा
संस्कार विधि भारतीय संस्कृति में संस्कारों का विशेष महत्त्व है। संस्कार हमारे जीवन के आधार हैं। संस्कार का अर्थ होता है शुद्ध करना, साफ करना, चमकाना और भीतरी रूप को प्रकाशित करना। हमारी दिनचर्या की भांति हमारी जीवनचर्या भी नियमित है। जन्म से लेकर मृत्यूपर्यंत के मानव जीवन का गंभीर अध्ययन करके महर्षि दयानन्द ने मनुष्य के पूर्ण विकास के लिए- ऐसा विकास जिसमें शरीर, मन, आत्मा तीनों की उन्नति हो, जिन सुनहरे नियमों की रचना की है उन्हें हम अपनी जीवनचर्या के नियम कहते हैं। हमारे संस्कार भी इसी जीवनचर्या के प्रमुख अंग हैं। आइये महर्षि दयानन्द कृत संस्कार विधि द्वारा सोलह संस्कारों की पूर्ण विधि जानें। विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द