संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
आर्यसमाज के नियम १. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है। २. ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। ३. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना- पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। ४. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। ५. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिएँ। ६. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। ७. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए। ८. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए। ९. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए। १०. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें॥
० टकारा
संस्कार विधि भारतीय संस्कृति में संस्कारों का विशेष महत्त्व है। संस्कार हमारे जीवन के आधार हैं। संस्कार का अर्थ होता है शुद्ध करना, साफ करना, चमकाना और भीतरी रूप को प्रकाशित करना। हमारी दिनचर्या की भांति हमारी जीवनचर्या भी नियमित है। जन्म से लेकर मृत्यूपर्यंत के मानव जीवन का गंभीर अध्ययन करके महर्षि दयानन्द ने मनुष्य के पूर्ण विकास के लिए- ऐसा विकास जिसमें शरीर, मन, आत्मा तीनों की उन्नति हो, जिन सुनहरे नियमों की रचना की है उन्हें हम अपनी जीवनचर्या के नियम कहते हैं। हमारे संस्कार भी इसी जीवनचर्या के प्रमुख अंग हैं। आइये महर्षि दयानन्द कृत संस्कार विधि द्वारा सोलह संस्कारों की पूर्ण विधि जानें। विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द