भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

(१७) योनिरोग ।

योनि उस स्थान को कहते हैं कि जहां से वच्चा निकलता है और यही संयोग स्थान है । इसका और गर्भाशयका बहुत बड़ा संबंध है । इसके रोगों से गर्भाशय में और गर्भाशय के रोगोंसे इसमें अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । योनि कई प्रकार की होती है । इस के विगड़ने के मुख्य चार कारण होते हैं । (१) वुरा भोजन, (२) दूषित रज, (३) वीर्य दोष, (४) दैवका प्रकोप । इनके अनेक भेद हैं । (श० क०)

१—अनेक प्रकार की विगड़ी हुई योनि के भेद ।

( ३० वि० ३७ ३० श्लोक ५ मे २७ तक )

(१) वातल योनि—उस को कहते हैं कि जिसमें वायु पैदा करने वाले आहार-विहार और चेशे से वायु विगड़कर योनिमें मुड़े छेदने की सी पीड़ा और चाँटी चलनेका सा मालम हो । कर्कशता, सुख, आयाम और दूसरे वायु से पैदा होने वाले रोग हों तथा वायु के कारण थोड़ा सा पतला, रूखा, आवाज करता हुआ भागदार रक्त निकला करे ।

(२) पित्तल योनि उसको कहते हैं कि जिस में खटाई, नमक, खार इत्यादि मिले पदार्थों को अधिक खाने से पित्त द्वारा योनिरोग होता है । ऐसी योनिमें दाह, पाक ज्वर-सुक गर्मी से व्यास नीला, पीला और काला खून निकलता है । इसमें मुड़े कीसी अधिक दुर्गन्ध आती है ।

(३) शैलिक योनि—उसको कहते हैं कि जिस में अभिप्यन्दी आहार खाने से कफ बढ़ कर स्त्री की योनिमें कफज रोग उत्पन्न करता है । इसके कारण योनि में शीतलता, चिप-