भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें चरबीका बढ़ना ।

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रज वन्द हो जाता है । कभी कभी निकल भी आता है । कभी दो दो तीन तीन मास तक नहीं होता । अतएव गर्भ का सन्देह हो जाता है । इसका कारण गर्भाशय के मुखकी संकीर्णता भी है । प्रायः ऐसी दशामें गर्भाशय में रक्त जम भी जाता है, जिस से अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । गर्भाशय में रज-एकत्र होने और चर्बी के प्रकोप से दूषित होने के कारण रज-जन्तुओं को हानि पहुँचती है । ऐसे स्त्री और पुरुष संयोग नहीं कर सकते । मैथुन में इनका ढम उखड़ जाता है, देह शिथिल हो जाती है, पसीना निकलने लगता है, ब्रह्मराहट् प्रारम्भ हो जाती है, स्वार्स चलने लगता है, व्यास लग आनी है और उठना बैठना कठिन हो जाता है ।

लोग इसको अच्छा समझते हैं कि शरीर मोटा रहे, परन्तु यह बहुत बुरा रोग है । ऐसे स्त्री पुरुष कि जिनका शरीर चर्बी का स्थान हो रहा है, कभी सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते । क्यों कि गर्भाशय चर्बी के विकार से चिंकना होने पर वीर्य ग्रहण नहीं करता और पुरुष के मोटे होने पर इन्द्रिय निश्चित स्थान पर वीर्य नहीं पहुँचा सकती । दोनों में मेद-वृद्धि होनेसे सन्तान नहीं होती, लेकिन उन मोटे स्त्री पुरुषों से सन्तान होती है कि जिनका शरीर रक्त से मोटा हो गया है और रजो-धर्म में विगाड़ और गर्भाशय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है । (रतिशास्त्र)

मोटापन प्रारम्भ होते ही यह निश्चय करना चाहिये कि शरीर रक्त के कारण मोटा हो रहा है या चर्बी से । यदि चर्बी से हो रहा हो, तो ऐसे पदार्थ, जो चर्बी बढ़ाने में सहायक हों, तुरन्त छोड़ देने चाहिये । ऐसी अवस्था में किसी प्रकार का परिश्रम प्रारम्भ करके आराम छोड़ देना परम हितकर है ।