संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
16. मेंद-बुद्धि अर्थात् शरीर में चरबी का बढ़ना
मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें चरबीका बढ़ना ।
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रज वन्द हो जाता है । कभी कभी निकल भी आता है । कभी दो दो तीन तीन मास तक नहीं होता । अतएव गर्भ का सन्देह हो जाता है । इसका कारण गर्भाशय के मुखकी संकीर्णता भी है । प्रायः ऐसी दशामें गर्भाशय में रक्त जम भी जाता है, जिस से अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । गर्भाशय में रज-एकत्र होने और चर्बी के प्रकोप से दूषित होने के कारण रज-जन्तुओं को हानि पहुँचती है । ऐसे स्त्री और पुरुष संयोग नहीं कर सकते । मैथुन में इनका ढम उखड़ जाता है, देह शिथिल हो जाती है, पसीना निकलने लगता है, ब्रह्मराहट् प्रारम्भ हो जाती है, स्वार्स चलने लगता है, व्यास लग आनी है और उठना बैठना कठिन हो जाता है ।
लोग इसको अच्छा समझते हैं कि शरीर मोटा रहे, परन्तु यह बहुत बुरा रोग है । ऐसे स्त्री पुरुष कि जिनका शरीर चर्बी का स्थान हो रहा है, कभी सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते । क्यों कि गर्भाशय चर्बी के विकार से चिंकना होने पर वीर्य ग्रहण नहीं करता और पुरुष के मोटे होने पर इन्द्रिय निश्चित स्थान पर वीर्य नहीं पहुँचा सकती । दोनों में मेद-वृद्धि होनेसे सन्तान नहीं होती, लेकिन उन मोटे स्त्री पुरुषों से सन्तान होती है कि जिनका शरीर रक्त से मोटा हो गया है और रजो-धर्म में विगाड़ और गर्भाशय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है । (रतिशास्त्र)
मोटापन प्रारम्भ होते ही यह निश्चय करना चाहिये कि शरीर रक्त के कारण मोटा हो रहा है या चर्बी से । यदि चर्बी से हो रहा हो, तो ऐसे पदार्थ, जो चर्बी बढ़ाने में सहायक हों, तुरन्त छोड़ देने चाहिये । ऐसी अवस्था में किसी प्रकार का परिश्रम प्रारम्भ करके आराम छोड़ देना परम हितकर है ।
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सन्तति-शास्त्र ।
(१७) योनिरोग ।
योनि उस स्थान को कहते हैं कि जहां से वच्चा निकलता है और यही संयोग स्थान है । इसका और गर्भाशयका बहुत बड़ा संबंध है । इसके रोगों से गर्भाशय में और गर्भाशय के रोगोंसे इसमें अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । योनि कई प्रकार की होती है । इस के विगड़ने के मुख्य चार कारण होते हैं । (१) वुरा भोजन, (२) दूषित रज, (३) वीर्य दोष, (४) दैवका प्रकोप । इनके अनेक भेद हैं । (श० क०)
१—अनेक प्रकार की विगड़ी हुई योनि के भेद ।
( ३० वि० ३७ ३० श्लोक ५ मे २७ तक )
(१) वातल योनि—उस को कहते हैं कि जिसमें वायु पैदा करने वाले आहार-विहार और चेशे से वायु विगड़कर योनिमें मुड़े छेदने की सी पीड़ा और चाँटी चलनेका सा मालम हो । कर्कशता, सुख, आयाम और दूसरे वायु से पैदा होने वाले रोग हों तथा वायु के कारण थोड़ा सा पतला, रूखा, आवाज करता हुआ भागदार रक्त निकला करे ।
(२) पित्तल योनि उसको कहते हैं कि जिस में खटाई, नमक, खार इत्यादि मिले पदार्थों को अधिक खाने से पित्त द्वारा योनिरोग होता है । ऐसी योनिमें दाह, पाक ज्वर-सुक गर्मी से व्यास नीला, पीला और काला खून निकलता है । इसमें मुड़े कीसी अधिक दुर्गन्ध आती है ।
(३) शैलिक योनि—उसको कहते हैं कि जिस में अभिप्यन्दी आहार खाने से कफ बढ़ कर स्त्री की योनिमें कफज रोग उत्पन्न करता है । इसके कारण योनि में शीतलता, चिप-
योनिरोग ।
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चिपापन, खुजली, दर्द और पाएडुता होती है और उससे पीला, गिलगिला रक्त निकलता रहता है ।
(४) सन्निपातिकयोनि—उसको कहते हैं कि जिसमें वात, पित्त और कफ पैदा करनेवाले आहारके सेवनसे योनि और गर्भाशयमें भिन्न भिन्न वायु कुपित होकर अपने अपने लक्षण उत्पन्न करें और उन रोगोंके होनेसे दाह, शूल और पीड़ा अधिक हो । योनिसे सफेद और गिलगिला रज निकला करे ।
(५) रक्तपित्तज योनि—उसको कहते हैं कि रक्त पित्त उत्पन्न करनेवाले आहारसे योनि दूषित होकर रक्त अधिक निकलने लगता है और वीर्य ग्रहण करने पर भी सन्तान नहीं होती ।
(६) अरजस्का योनि—उसको कहते हैं कि योनि और गर्भाशयमें रहा हुआ पित्त जब रक्तको बिगाड़ देता है तब रजस्वला होना बन्द हो जाता है और स्त्री अत्यन्त दुर्बल हो जाती है ।
(७) अचरणा योनि—उसको कहते हैं कि जिसमें साफ न रखनेके कारण छोटे छोटे कीड़े पड़ जावें और खुजलीके कारण पुरुष-सयोगकी बहुत इच्छा हो ।
(८) अतिचरणा योनि—उसको कहते हैं जो अति मैथुन करनेके कारण वायु बिगाड़कर योनिमें सूजन, सुख और दर्द उत्पन्न कर देती है ।
(९) प्राक्चरणा योनि—उसको कहते हैं कि थोड़ी अवस्थाकी स्त्रीके साथ सयोग करनेसे स्त्रीकी पीठ, जाँघ, ऊरु और वक्षमें दर्द पैदाकर वायु योनि को दूषित कर देती है । (इसी कारण अत्यन्त कम अवस्थामें संयोग मना किया
६
17. योनि-रोग
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सन्ततिशास्त्र ।
गया है, भोलह वर्षसे कम अयस्थाधाली स्त्रीसे संयोग न करना चाहिये ।)
(१०) ऋतुला योनि—उसको कहते हैं जो कफ पैदा करनेवाले अधिक आहारके खाने तथा कै स्वाँसाठिको रोकनेसे दूषित वायु कफको योनिमें पहुँचाकर योनिको दूषित कर देती है। उस समय योनिमें सूर्य गड़ानेके समान दर्द होता है। पीला वा सफेद रंगका स्त्राव होता है या सफेद कफ सरीखा स्त्राव निकलता है।
(११) परिष्कृता योनि—उसको कहते हैं जब पित्तम क्षतिवाली स्त्री संयोगके समय लौक और डकारको रोक लेवे तो पित्तके साथ वायु विगड़कर स्त्रीकी योनि विगड़ जाती है। उस समय योनिसे स्पर्श नहीं किया जाता। दर्दके साथ नीले, पीले रंगका स्त्राव होने लगता है। स्त्रीकी कमर, पीठ और वक्षस्थलमें दर्द और ज्वर होता है।
(१२) स्वावृत्ता योनि—उसको कहते हैं जो अधोवेग अर्थात् नीचेकी हवाको रोकनेसे हो। वायुके कारण योनिका वेग ऊपरको होता है, इससे कफके साथ रज निकलता है।
(१३) कर्णिका योनि—उसको कहते हैं कि छोटी उम्रमें गर्भ रह जानेसे आच्छादित वायु, कफ और रक्तसे मिली हुई योनिमें एक तरहकी कर्णिका उत्पन्न कर देती है। इससे रक्तका रास्ता रुक जाता है।
(१४) युष्मो योनि—उसको कहते हैं कि जब गर्भ स्त्रीके दूषित रक्तसे उत्पन्न होता है। तब वायु सूखेपनके कारण जरा गर्भको बार बार नष्ट कर दिया करती है।
(१५) द्वादशतिनी योनि—उसको कहते हैं कि जिस योनिमें रक्तके
योनिरोग ।
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निकलनेपर तुरंत चैन पड़ जावे। रज ऊपर जानेसे इसे उदावर्तिनी योनि कहते हैं।
(१६) अंतर्मुखी योनि—उसको कहते हैं जब खूब भोजन करनेके पीछे स्त्री उलटे और टेढ़े इत्यादि होकर संयोग करे तो अन्दरकी वायु योनिमें आकर योनि मुखको देहा कर देती है। इससे मांस और हड्डियाँमें पीड़ा होती है। ऐसे समयमें स्त्रीके साथ मैथुन नहीं किया जा सकता।
(१७) सूचीमुखी योनि—उसको कहते हैं किमाताके दोषके कारण वायु सूखापन लेकर गर्भकी कन्याके योनिको दूषित करके योनिस्त्राको छोटा कर देती है।
(१८) शुष्का योनि—उसको कहते हैं कि मैथुन समयमें जब स्त्री पाखाना और पेशाबके वेगोंको रोक लेती है तो उसके मल और मूत्रके रुकनेसे योनि सूखी हो जाती है।
(१९) वामिनी योनि—उसको कहते हैं कि गर्भाशयमें पहुँचा हुआ वीर्य दृढ़के साथ या बिना दृढ़के ही छू या सात दिनके अन्दर गर्भाशयसे निकल जाता है।
(२०) पण्डी—उसको कहते हैं कि जिसके जीज-दोषके कारण गर्भस्थ कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जावे। उसको पुष्प-समागमकी इच्छा नहीं होती और न छाती निकलती है। ऐसी स्त्री हिजड़ी होती है। इसका इलाज नहीं हो सकता।
(२१) महा योनि—उसको कहते हैं कि दुःख पहुँचानेवाली दूदी चारपाई पर सोकर उलटी रीतिसे संयोग करनेपर वायु बिगड़ कर गर्भाशय और योनि मुखको रोक देती है। इससे योनि अस्वच्छमुखा, दूरयुक्त रूखा और भाग दार रज निकलनेवाली होती है और योनिमुखका मांस उंचा
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सन्ततिशास्त्र ।
उठ जाता है। ऐसी स्त्रीके जोड़ और पेड़में शूल होने लगता है।
इन इकीस प्रकारके योनि-रोगों के उपद्रवोंसे योनि और्यको ग्रहण नहीं करती और न ऐसी स्त्रीको गर्भ ही रहता है, अनेक प्रकारके रोग, गुल्म, अर्श और प्रदर इत्यादि उत्पन्न होते हैं। इन रोगोंमें हमेशा स्त्रीको वायुका दोष होता है। इन इकीस प्रकारके योनि-रोगोंमें वातज, पित्तज कफज और त्रिदोषज इनमें मामूली दोष होता है। रक्त पित्तज और त्ररजस्का पित्तजन्य है, परिप्लुता और वामिनी वातपित्तज त्मक, कर्णिनी और उपप्लुता वात-कफज और वाकी सब वातज हैं। वातादि दोष सारे रोगोंमें अपने अपने लक्षण प्रकाश करके जोड़ों उत्पन्न करते हैं।
२. बाहरी योनिकी मामूली सूजन।
इसके कई कारण हैं।
(५७० क०)
१. वह कारण जब कि वह रोग रुदकिशोरों में हो।
१. सफाईका न होना और रोगोंकी छूत पहुँचनेसे।
२. चोट लगनेसे।
२ वह कारण जब कि वह रोग जवान स्त्रियोंमें हो।
१. अतिमैथुन और सफाईका न होना।
२. प्रदर और बाहरी चोट लगने से।
३. वदद्वार चीज या छूतदार रोगोंकी छूतसे।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।
१. पीड़ा—जहाँ सूजन हो।
२. कमर, पैड़ और जाँघमें दर्द।
३. पेशाब जलनेके साथ होना।
४. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता है।
योनिरोग ।
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५. कभी कभी जब योनिसे घर्दवृ आती है तब सूजन से मवाद पड़ जानेका सन्देह होता है ।
पीड़ाके अनुसार सूजनका अनुमान करना चाहिये । जैसी कम ज्यादा सूजन होती है कष्ट उतना ही कम ज्यादा होता है । घर्दवृ रोगमें गर्भ नहीं रहता ।
३. योनीकी सङ्गन ।
इसके अनेक कारण होते हैं ।
१. सूजनके पक जानेपर जब छूत या गन्द्गीका असर पहुंच जावे ।
२. शीतला रोगके पीछे जब कि घाव हो जावे और किसी तरह की गन्द्गी पहुँचे, या गरमी संजाकके अत्यन्त प्रकोपसे ।
३. बालके उखड़ जानेसे जब किसी तरह की गन्द्गी पहुँचे ।
४. योनिके घावमें पानी या श्वेत प्रदरके चिकने पदार्थोंके लगनेसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. जलन और दर्द ।
२. योनि मुखपर यदि सङ्गन है तो सामनेसे साफ़ दिख-लाई पड़ेगी । यदि अन्दर है तो योनिके ओठोंको उलट कर देखनेसे साफ़ पता चलेगा ।
३. कुछ ज्वर अवश्य आ जाता है ।
यह रोग लड़कियोंमें पाया जाता है और जवान स्त्रियों को भी होता है ।
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सन्तति शास्त्र ।
योनिकन्द ।
इसके अनेक कारण हैं। (रतिशास्त्र)
१. अतिमैथुन और रजका विगाड ।
२. योनिमें नाखून लगाने, घाव और जखम हो जाने से ।
३. वायुके विगड जानेसे ।
४. पीप पड जाने और रक्तके दूषित होनेसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. योनिमें पीडा और भारीपन मालूम होना ।
२. चलने, फिरने और उठने बैठनेमें पीडा होना ।
३. यदि योनिकन्द रुखा, खुरखुरा और फटा हुआ मालूम हो तो वातजन्य समभन्ना चाहिये ।
४. यदि नीले फूलके समान हो और खजली आती हो तो कफजन्य समभन्ना चाहिये ।
५. यदि उसमें वह और काला रंग हो और ज्वर आवे तो पित्तज समभन्ना चाहिये ।
६. यदि वात, पित्त और कफ तीनोंके लक्षण मिलें तो त्रिदोषज समभन्ना चाहिये ।
यह एक विचित्र रोग है । इसमें योनिके अन्दर बड़हल के फल के समान एक गाँठ होती है । इसीको योनिकन्द कहते हैं ।
५. योनिका घाव ।
इसके कई कारण हैं ।
(श क )
१. रज और योनिके विकारसे ।
२. उपदंश और गर्भाशयके अनेक क्षतदार रोगोंसे ।
३. रक्तविकार और सूजनके उपद्रवोंसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
योतिरोग ।
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- १. सूर्य चुभोनेके समान पीड़ा होती है ।
- २. घाव जल्दी बढ़ता है ।
- ३. घाव उभरा नहीं होता, बराबर रहता है ।
- ४. निर्बलता बढ़ जाती है और शरीर दुर्बल होता चला जाता है ।
५. रक्ता बहाव बराबर जारी रहता है । यह एक बड़ा कठिन रोग है । रक्तमें बड़ी बढ़त आती है । पेशा जल्म बढ़ा और दो तरहसे होता है । पहले एक दाना पड़ता है और वह फूटकर फैलने लगता है । दूसरा इस तरह होता है कि एक गाँठ सरीखी पड़कर पक जाती है और बाव फैलता चला जाता है । प्रायः काले रंगकी अग्नेड खियोंमें, जिनकी अवस्था ४० वर्षसे कुछ कमवेश हो, यह रोग अधिक होता है ।
६. योनिभ्रंश ।
इसके कई कारण हैं ।
(१० क्र०) ।
- १. गर्भाशयके आगे दल जानेसे ।
- २. कूदने, दौड़ने और ऊँचे नीचे चढ़नेसे ।
- ३. मुख या पीठके बल गिर पड़नेसे ।
- ४. गर्भाशयके दल जानेके अनेक कारणोंसे । (इस विषयमें पहले लिख चुके हैं ।)
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
- १. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट ।
- २. लसदार पतला पदार्थ योनिसे गिरना ।
- ३. पेशाब, पाखानेमें कष्ट होता है ।
- ४. आगे वजन मालूम होता है ।
- ५. पैड़में मरोडके समान दर्द होता है ।
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सन्तति-शास्त्र ।
योनि दो तरहसे भ्रंश होती है। आगे और पीछे। जब योनि आगेकी ओर उतरती है तब उसके साथ मुत्राशय भी उतर जाता है और साथ ही साथ धातु जाने लगती है। जब योनिके पीछेका भाग उतरता है तब उसके साथ गुदाका कुछ भाग भी उतर जाता है। यह दशा कठिन है।
७. योनिकी गहरी सूजन।
इसके अनेक कारण हैं। ( श० क० )
१. मूत्रके रास्तेकी सूजनसे।
२. श्रन्दर घाव हो जाने से।
३. सर्दी लगने और जहरीले जन्तुके काटनेसे।
४. योनि साफ न रहने और आस पासमें सूजन होनेसे।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।
१. खाजका होना और जलन मालूम होना।
२. पेशाब होते समय अत्यन्त कष्ट होना और चिकने पदार्थका गिरना।
३. मैथुनमें पीड़ा और कुछ ज्वरका रहना।
इस प्रकारकी गहरी सूजन दूर तक होती है। जब कभी गरमी सूजकके कारण छूत पहुँचती है तो पाक भी हो जाता है। इसमें उमरका नियम नहीं। हर उमरमें यह रोग होता है; परन्तु खासकर उन स्त्रियोंको कि जिनके कई बच्चे हो चुके हों, या जो अत्यन्त निर्बल हों।
८. योनिकी खुजली।
इसके अनेक कारण होते हैं। ( श० क० )
१. मसानेकी खुजलीकी छूतसे।
२. बाहरसे अनेक प्रकारकी छूत पहुँचनेसे।
योनिरोग ।
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३. रक्तके दूषित हो जानेसे ।
४. योनिमें दांतोंके पड़ जानेसे ।
५. योनिकी गन्धगी और उपर्दशके विकारसे ।
६. ऋतुधर्मके विगाड़से ।
७. प्रेन्दर और मूत्राशयके शोथसे ।
८. योनिके भीतर और योनि-मुखके शोथसे ।
९. योनिके मुखसे छोटे छोटे कीड़ोंके पैदा हो जानेसे ।
१०. योनिकी गन्धगीसे जब कि अन्दर सफाई न की जावे ।
११. अन्दर मैल और पसीनेके जम जानेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. पहले खाज कम होती है । ज्यों ज्यों खुजलाया जाता है, जलन अधिक होती है ।
२. खाजकी जलन सहन नहीं होती ।
३. योनिका रस्ता कुछ सकरा पड़ जाता है ।
४. रोग बढ़नेपर बढ़ बढ़ता आती है ।
पेसी खुजली कफके विगाड़से होती है । यह योनिके अन्दर हर जगह पर हो सकती है । जरा जरासे ढोढ़े भी पड़ जाते हैं ।
६. योनिकी फुंसियाँ ।
इसके कई कारण हैं । ( १० को )
१. रज विकार और छूतका बाहर या भीतरसे पहुँचना ।
२. योनिकी गन्धगी और रक्त निकलनेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. जलन, दर्द कुछ सज़नका होना और मैथुनन हो सकता ।
२. ज्वर और खाजका आना, उठने बैठनेमें कष्ट ।
यह रोग योनिके हर स्थानपर हो सकता है । रोग बढ़नेपर योनिके छूनमें भी अधिक पीड़ा होती है ।
६०
सन्तति-शास्त्र ।
इस प्रकार अनेक रोगोंसे योनि दूषित हो जाती है और फिर वह वीर्य ग्रहण नहीं करती। अतएव सन्तानका होना कठिन हो जाता है। रोगके प्रारम्भमें अनेक प्रकारके सन्देशों से कुछ परवाह नहीं की जाती। परिणाम यह होता है कि रोग अच्छी तरह बढ़ जाता है और फिर बड़ी कठिनाई पड़ती है। अतएव रोग प्रारम्भ होते ही यल करना चाहिये।
( १८ ) मूत्ररोग ।
यह बहुत बड़ा रोग है। मल और मूत्रकी पराचीसे शरीर नाश हो जाता है। इनसे अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होकर बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ उपस्थित करते हैं। जब मूत्ररोग हो तो योनि गर्भाशय और मसानेके रोगोंपर अवश्य विचार करना चाहिये। इसके कारण और भी हैं, परन्तु बहुधा इन्हींसे यह रोग होता है। इसके अनेक भेद हैं।
१. मूत्रके मार्ग (रास्ते) की जलान ।
इसके अनेक कारण हैं ।
(रति-शास्त्र।
१. गुर्देकी खुजली, योनिमार्गमें शोथ और घाव ।
२. रज कष्टसे आना और गर्मी सूजाके विकारसे ।
३. योनिके भीतरी घाव और रजविकारसे ।
४. शरीरमें पित्तकी अधिकता और मसानेकी खुजलीसे ।
५. गुर्दे, मसानेके घाव और पाक होनेसे ।
६. मूत्रमार्गकी नलीकी सूजन और गर्भाशयके मुखाके घावोंसे ।
७. प्रदर और कुसमयमें रज निकलनेसे ।
८. कलेजकी गर्मी और गर्भाशयके टल जानेसे ।
मूत्ररोग ।
२१
१. मूत्रमार्गकी नलीकी चोट और दाने-पड़ जानेसे ।
१०. गर्भअण्डकी सूजन और अतिमैथुनसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. मूत्रमें तेजी, जलन और विशेष खारापन ।
२. मूत्रका रंग पीला हो ।
३. शरीरमें सूखापन और खुरखुराहट ।
४. मूत्रका जलनके साथ निकलना ।
५. बारंबार मूत्र निकलना ।
इस रोगमें बहुत कष्ट होता है । वह जानेपर इसके साथी दूसरे रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
२. मूत्र बन्द हो जाना ।
इसके कई कारण हैं । (रतिभास्त्र)
१. गुदोंकी सूजन और मत्तानेमें हवाका भर जाना ।
२. मूत्रकी नलीमें रुकावट, चाहे वह कैसी ही हो ।
३. मत्तानेकी सूजन, पीप और रक्तका जमाव ।
४. मूत्रकी नलीमें सूजाकके जन्म होनेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. नलीका भारी मलूम होना और दर्द इत्यादि ।
यह कठिन रोग है । जब मूत्रकी नलीमें जन्म पड़ जाता है तो आरुछा होनेपर वहाँ मांस बढ़ने लगता है और ऊँचा होकर नलीको रोक लेता है । इससे मूत्र रुक जाता है ।
३. एक एक थुँद मूत्र आना ।
इसके तीन भेद और अनेक कारण हैं । (श० क०)
१. पहला भेद—इसके ये कारण हैं—
१. गर्मीसे मूत्रमें तेजीका होना और अतिमैथुन ।
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सन्तति-शास्त्र ।
१. गरम पदार्थके खाने और सूजाकके विकारसे ।
इस रोगमें ये लक्षण होते हैं ।
१. मूत्रमें जलन और पीला रंग ।
२. कड़क और रुक रुककर मूत्र निकलना ।
२. दूसरा भेद-इसके कई कारण हैं ।
१. मसानेपर सर्दीका पहुँचना ।
२. मसानेके पट्टोंमें दीलापन होनेसे ।
३. मसानेकी रक्तावदसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. सफेद मूत्रका आना और प्यास अधिक लगना ।
२. आप ही आप थोडेसे मूत्रका निकल जाया करता ।
३. कभी छिछड़ासा निकल आना ।
३. तीसरा भेद-इसके ये कारण हैं ।
१. मसानेकी सूजन और उसमें रक्त अम जानेसे ।
२. मसानेकी खुजली और घावसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. पेशाबकी रगतका लाल होना ।
२. मूत्रके साथ पीप और मांसके रेशोंका आना ।
इन रोगोंका किसी विशेष अवस्था में होना निश्चित नहीं है । जब चाहे तभी विकार उत्पन्न हो जाय, परन्तु यह रोग बच्चोंको कम होता है ।
४. अधिक मूत्रका आना ।
इसके कई कारण हैं ।
१. मसाने और उसके पट्टोंका उदकके कारण शो क० दीला पड़ जाना ।
मूत्ररोग ।
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२. दिमागी काम करना और रजका घिगड़ना ।
३. पाचन शक्ति का कम होना ।
इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. बारबार पेशाब का आना ।
२. अत्यन्त निर्बलता और प्यास लगना ।
३. मूत्रमें सफेदी ।
यह रोग प्रायः चालीस वर्ष के लग भग होता है । निर्बल स्त्रियाँ इस रोग में अधिक फँसती हैं ।
५. मूत्रके साथ रक्तका आना ।
इसके तीन भेद और अनेक कारण हैं । (रति शास्त्र )
१. पहला भेद—कोई नस गुर्दे में खुल जाने या फट जानेसे । इसमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. साफ और पतला रक्त बिना पीड़ा के निकलता है ।
२. रगों के मुख खुलनेपर थोड़ा थोड़ा रक्त आता है ।
३. यदि रग फट गई हो तो अधिक रक्त निकलता है ।
४. रक्त रक्त जानेसे भित्स्वकी हड्डियोंकी ओर देर्य होता है ।
॥ दूसरा भेद—इसमें गुर्दा और कलेजा निर्बल होने और रक्त बन कर शरीर में ठीक ठीक न पहुंचने से या गुर्दे पर चोट लगने से ।
इसमें कई लक्षण होते हैं ।
१. मूत्र मांस धोवन के समान लाल हों जब कि कलेजे का विकार हो ।
२. गुर्दे के विकार से मूत्र सफेद और कुछ गाढ़ा हो ।
३. तीसरा भेद—इसमें मूत्रमार्ग के श्रवण की रगों में जखम हो जाते हैं । प्रायः मसाने की रगोंमें ऐसा जखम होता है ।
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सन्तति-शास्त्र ।
इसमें कई लक्षण होते हैं ।
१. मूत्र निकलने में अत्यन्त कष्ट ।
२. पीप सहित मूत्र रक्तके साथ आता है ।
३. मूत्र में वद्व आती है ।
यह रोग जवान और अमीर स्त्रियों को बहुत होता है । इसमें नंबर २ का रोग वृद्धी स्त्रियों में भी पाया जाता है ।
इस प्रकार मूत्र-रोगों से स्त्रियों में अनेक दूसरे रोग उत्पन्न होते हैं । अतएव रोग उत्पन्न होते ही यल करना आवश्यक है ।
( १६ ) प्रदर रोग ।
यह एक बड़ा बलवान रोग है । आज कल सौ में पंचानने स्त्रियाँ इससे प्रसित देखी जाती हैं, परन्तु इसको मामूली बात ब्याल करके जरा भी परचाह नहीं की जाती । या यों कहिये कि उनको इस रोग की भलाई बुराईकी वाचत कुछ मालूम नहीं है । वैद्य, हकीम और डाक्टर तीनों की यही राय है कि इससे शरीरका सर्वनाश हो जाता है ।
१. वैद्यका मत ।
वैद्योंने यह माना है कि जो स्त्री अत्यन्त तमक खटाई, चर-पर जलन पैदा करने वाले और चिकनाई से बने हुये, चर्बी बढ़ाने वाले तथा आम्र्य और औष्ठक पशुओंका मांस, चिकड़ी सिर, दही, सिरका, मन्थ और शराब हमेशा सेवन करती है, उसकी वायु विगड़कर प्रमाणसे अधिक रक्त निकलता है । रज निकलनेवाली शिराओंमें रक्तके साथ वायु पहुंच कर रजको बढ़ा देती है । इसको रक्तप्रदर कहते हैं ।
( ३० चि० ३० न० १३४ )
इसप्रकार वर्णन करते हुए वैद्योंने प्रदर चार प्रकार का माना है ।
प्रदर रोग ।
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१. वातजनित प्रदर । इसका निम्न कारण है—
१. रुग्णादि (रुखे) पदार्थों के खानेसे वायु विगाड़कर पहले (ऊपर कहे हुए) की भाँति रुधिरको लेकर प्रदर उत्पन्न करती है । ( च० चि० अ० ३० श्लो० १२७ )
इसके अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. इसमें रक्त भागदार, पतला, रुखा, काला या लाल रंग-का होता है । देखनेमें पलाशके औंटाए जलके समान हो । इसमें पीड़ा होती भी है और नहीं भी । वायुके कारण कमर, वक्ष, हृदय, पसली, पीठ और नितबोंमें कठिन पीड़ा उत्पन्न होती है । ( च० चि० अ० २० श्लो० १३८ )
२. पित्तजनित प्रदर—इसके निम्न कारण हैं ।
१. खट्टे, गर्म, नमकीन और खारे पदार्थों के बहुत खानेसे पित्त विगाड़कर पहले (ऊपर कहे हुए) की भाँति प्रदर उत्पन्न करता है । ( च० चि० अ० ३० श्लो० १३९ )
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. इसमें रक्त कुछ कुछ नीला, पीला और श्रत्यंत गरम, काला और पीड़ाके साथ वारम्बार निकलता है । इसमें दाह, लाली, प्यास, मोह, ज्वर और भ्रम, ये उपद्रव होते हैं । ( च० चि० अ० ३० श्लो० १४० )
३. कफजनित प्रदर—इसका निम्न कारण है ।
१. भारी पदार्थों के खानेसे कफ विगाड़कर पहले ( ऊपर कहे हुए) की भाँति प्रदर उत्पन्न करता है ।
( च० चि० अ० २० श्लो० १४१ )
इसके अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. इसमें रक्त गिलगिला, पीला, भारी, चिकना, शीतल
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सन्तति-शास्त्र ।
और भागदार निकलता है। पीड़ा कम होती है। कै, अस्त्रि, स्वांस्तरोग और खांसी होती है।
( च० चि० अ० ३० श्लो० १४२ )
४ मन्निपातिक प्रवर—इसका निम्न कारण है।
१. वात, पित्त और कफ्फे जो कारण उपर कहे गए हैं वे सब इसमें होते हैं। ( च० चि० अ० ३० श्लो० १४३ )
२. वात, पित्त और कफ्फे जो कारण उपर कहे गए हैं वे सब इसमें होते हैं। ( च० चि० अ० ३० श्लो० १४४ )
यह रोग अच्छा हो सकता है, परन्तु जिसे वरावर रक्त निकला करे, प्यास दह और ज्वर हो, रक्तके अधिक निकलने से स्त्री दुर्बल हो जाय, जिसका बहुतसा रक्त निकलगया हो, ऐसी स्त्रीका प्रवर अच्छा नहीं होता। अतएव औषधि करना न्यर्थ है। ( चर्क )
प्रवर दो प्रकार का होता है। रक्त प्रवर और श्वेत प्रवर। रक्त प्रवरमें रक्त निकलता है। श्वेत प्रवरमें चिकना श्रयवा पानी सरीखा सफेद रंगका स्नाव होता रहता है।
२. डाकट्टोंका भत ।
इस भतमें भी दो प्रकारके प्रवर माने गए हैं। एक वह कि जिसमें केवल पानी सरीखा सफेद रंगका स्नाव होता है; दूसरा वह कि जिसमें कुछ लासी लिये पतला या गाढा स्नाव होता है। यह दो स्थानोंसे होता है—यौनि और गर्भाशयसे। इसलिये कोई इसको यौनि प्रवर और कोई गर्भाशयका प्रवर कहते हैं। इन दोनोंके अनेक कारण हैं।
१. यौनि और गर्भाशयका शोथ ।
२. गर्भाशयका मस्सा और गर्भ-स्नाव हो जाना ।
प्रदर रोग ।
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३. अतिमैथुन और गर्भाशयमें सर्दी पहुंचनेसे ।
४. उपदंशके अनेक विकारोंसे ।
५. पांडुरोग, दूषित आहार और रजके बिगाड़से ।
६. कुपच और शरीरका निर्बल हो जाना ।
७. अतिमैथुनसे योनिमें घाव होने और पक जानेसे ।
८. गर्भाशयके रोग झाले, मस्से, शोथ, टल जाने, मोटे पड़ जाने और दग्ध हो जानेसे ।
९. योनिमें झाले, दाने और जख्म हो जानेसे ।
१०. जहरीले ज्वर और क्षय इत्यादिसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१ ज्वर, सर, कमर और नेत्रोंमें पीड़ा, अपच, हृदय, पसली, पीठ, नितम्बोंमें कठिक दर्द, प्यासका लगना साँसका उखड़ जाना, खाँसी कैंपकैंपी इत्यादि ।
यह बड़ा विलक्षण रोग है । इसमें प्रायः ऋतुवर्षके बाद दो तीन दिन तक सफेद खाव हुआ करता है । परन्तु चे स्त्रियाँ कि जो विशेष कारणोंसे इस रोगमें फँसती हैं, उनको नित्य होता है । बड़े हुए रोगमें ऐसे खावके साथ लाली अवश्य आती है । जब योनिसे सफेद खाव हो तो वह दूधमें मिले हुए पनीके समान पतला और सफेद होता है और जब ऐसा खाव गर्भाशयसे आता है तो चिकना और गढ़ा होता है, परन्तु इसमें कुछ वस्तु अवश्य आती है । जब गर्भ न रहे और चिकना खाव हुआ करे, तो गर्भाशयका शोथ इत्यादि जानना चाहिये । पतले सफेद खावमें योनिशोथ इत्यादि समझना चाहिये । जब इस दशामे झाले, घाव इत्यादि होजाते हैं तब लाली आती है या जब कर्मां ऐसी दशामें योनि और गर्भाशय की नष्ट इत्यादि किसी दवावके कारण फट जाती है-तो रक्तसे
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मिला हुआ पानी या चिकनाईके साथ रक्त आता है। यह रोग कुछ अधिक दिनोंतक यदि बराबर रहे, तो अनेक दूसरे रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
(२) सोम रोग ।
यह स्त्रियोंके लिये बहुत बुरा रोग है। जिनके पीछे लग जाता है वे जिन्दगीसे हाथ धो बैठती हैं। इसमें पेशाब बहुत होता है। बड़े हुए रोगमें तो यहाँ तक देखा गया है कि दम-दममें हुआ करता है। हर समय कपड़ातर रहता है। शरीरका पानी मसानेमें इकट्ठा होता है। धारण-शक्ति पेशाबकी नहीं हो सकती। थोड़ी थोड़ी देरमें प्यास लगती है। ज्यों ज्यों पानी पीया जाता है, पेशाब होता चला जाता है। पुराना 'होनेपर यह कलेजेको निर्बल कर देता है।
इसके अनेक कारण हैं ।
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१. अतिमैथुन और अत्यन्त शोक ।
२. अतिसार और विषका दोष ।
३. रज-विकार और मद्यपान ।
इसमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. निर्मल, शीतल, गंध-रहित, साफ, सफेद, चिना दुःखके पेशाब होता है ।
२. मूत्र रोकनेमें बेचैनी होना, मस्तक कनपरी और आँखोंमें झिपिलता तथा मुख व तालूका सूख जाना ।
३. मूत्र आती है, शरीर सूख जाता है। पीनेवाली चीजोंमें सन्तोष नहीं होता और अत्यन्त दुर्बलता बढ़ती है ।
इस रोगमें स्त्री गर्भ ग्रहण नहीं कर सकती । रज निकम्मा