भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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मूत्ररोग ।

२१

१. मूत्रमार्गकी नलीकी चोट और दाने-पड़ जानेसे ।

१०. गर्भअण्डकी सूजन और अतिमैथुनसे ।

इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।

१. मूत्रमें तेजी, जलन और विशेष खारापन ।

२. मूत्रका रंग पीला हो ।

३. शरीरमें सूखापन और खुरखुराहट ।

४. मूत्रका जलनके साथ निकलना ।

५. बारंबार मूत्र निकलना ।

इस रोगमें बहुत कष्ट होता है । वह जानेपर इसके साथी दूसरे रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।

२. मूत्र बन्द हो जाना ।

इसके कई कारण हैं । (रतिभास्त्र)

१. गुदोंकी सूजन और मत्तानेमें हवाका भर जाना ।

२. मूत्रकी नलीमें रुकावट, चाहे वह कैसी ही हो ।

३. मत्तानेकी सूजन, पीप और रक्तका जमाव ।

४. मूत्रकी नलीमें सूजाकके जन्म होनेसे ।

इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. नलीका भारी मलूम होना और दर्द इत्यादि ।

यह कठिन रोग है । जब मूत्रकी नलीमें जन्म पड़ जाता है तो आरुछा होनेपर वहाँ मांस बढ़ने लगता है और ऊँचा होकर नलीको रोक लेता है । इससे मूत्र रुक जाता है ।

३. एक एक थुँद मूत्र आना ।

इसके तीन भेद और अनेक कारण हैं । (श० क०)

१. पहला भेद—इसके ये कारण हैं—

१. गर्मीसे मूत्रमें तेजीका होना और अतिमैथुन ।