संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंमूत्ररोग ।
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१. मूत्रमार्गकी नलीकी चोट और दाने-पड़ जानेसे ।
१०. गर्भअण्डकी सूजन और अतिमैथुनसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. मूत्रमें तेजी, जलन और विशेष खारापन ।
२. मूत्रका रंग पीला हो ।
३. शरीरमें सूखापन और खुरखुराहट ।
४. मूत्रका जलनके साथ निकलना ।
५. बारंबार मूत्र निकलना ।
इस रोगमें बहुत कष्ट होता है । वह जानेपर इसके साथी दूसरे रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
२. मूत्र बन्द हो जाना ।
इसके कई कारण हैं । (रतिभास्त्र)
१. गुदोंकी सूजन और मत्तानेमें हवाका भर जाना ।
२. मूत्रकी नलीमें रुकावट, चाहे वह कैसी ही हो ।
३. मत्तानेकी सूजन, पीप और रक्तका जमाव ।
४. मूत्रकी नलीमें सूजाकके जन्म होनेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. नलीका भारी मलूम होना और दर्द इत्यादि ।
यह कठिन रोग है । जब मूत्रकी नलीमें जन्म पड़ जाता है तो आरुछा होनेपर वहाँ मांस बढ़ने लगता है और ऊँचा होकर नलीको रोक लेता है । इससे मूत्र रुक जाता है ।
३. एक एक थुँद मूत्र आना ।
इसके तीन भेद और अनेक कारण हैं । (श० क०)
१. पहला भेद—इसके ये कारण हैं—
१. गर्मीसे मूत्रमें तेजीका होना और अतिमैथुन ।