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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

इसमें कई लक्षण होते हैं ।

१. मूत्र निकलने में अत्यन्त कष्ट ।

२. पीप सहित मूत्र रक्तके साथ आता है ।

३. मूत्र में वद्व आती है ।

यह रोग जवान और अमीर स्त्रियों को बहुत होता है । इसमें नंबर २ का रोग वृद्धी स्त्रियों में भी पाया जाता है ।

इस प्रकार मूत्र-रोगों से स्त्रियों में अनेक दूसरे रोग उत्पन्न होते हैं । अतएव रोग उत्पन्न होते ही यल करना आवश्यक है ।

( १६ ) प्रदर रोग ।

यह एक बड़ा बलवान रोग है । आज कल सौ में पंचानने स्त्रियाँ इससे प्रसित देखी जाती हैं, परन्तु इसको मामूली बात ब्याल करके जरा भी परचाह नहीं की जाती । या यों कहिये कि उनको इस रोग की भलाई बुराईकी वाचत कुछ मालूम नहीं है । वैद्य, हकीम और डाक्टर तीनों की यही राय है कि इससे शरीरका सर्वनाश हो जाता है ।

१. वैद्यका मत ।

वैद्योंने यह माना है कि जो स्त्री अत्यन्त तमक खटाई, चर-पर जलन पैदा करने वाले और चिकनाई से बने हुये, चर्बी बढ़ाने वाले तथा आम्र्य और औष्ठक पशुओंका मांस, चिकड़ी सिर, दही, सिरका, मन्थ और शराब हमेशा सेवन करती है, उसकी वायु विगड़कर प्रमाणसे अधिक रक्त निकलता है । रज निकलनेवाली शिराओंमें रक्तके साथ वायु पहुंच कर रजको बढ़ा देती है । इसको रक्तप्रदर कहते हैं ।

( ३० चि० ३० न० १३४ )

इसप्रकार वर्णन करते हुए वैद्योंने प्रदर चार प्रकार का माना है ।

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