संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रदर रोग ।
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१. वातजनित प्रदर । इसका निम्न कारण है—
१. रुग्णादि (रुखे) पदार्थों के खानेसे वायु विगाड़कर पहले (ऊपर कहे हुए) की भाँति रुधिरको लेकर प्रदर उत्पन्न करती है । ( च० चि० अ० ३० श्लो० १२७ )
इसके अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. इसमें रक्त भागदार, पतला, रुखा, काला या लाल रंग-का होता है । देखनेमें पलाशके औंटाए जलके समान हो । इसमें पीड़ा होती भी है और नहीं भी । वायुके कारण कमर, वक्ष, हृदय, पसली, पीठ और नितबोंमें कठिन पीड़ा उत्पन्न होती है । ( च० चि० अ० २० श्लो० १३८ )
२. पित्तजनित प्रदर—इसके निम्न कारण हैं ।
१. खट्टे, गर्म, नमकीन और खारे पदार्थों के बहुत खानेसे पित्त विगाड़कर पहले (ऊपर कहे हुए) की भाँति प्रदर उत्पन्न करता है । ( च० चि० अ० ३० श्लो० १३९ )
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. इसमें रक्त कुछ कुछ नीला, पीला और श्रत्यंत गरम, काला और पीड़ाके साथ वारम्बार निकलता है । इसमें दाह, लाली, प्यास, मोह, ज्वर और भ्रम, ये उपद्रव होते हैं । ( च० चि० अ० ३० श्लो० १४० )
३. कफजनित प्रदर—इसका निम्न कारण है ।
१. भारी पदार्थों के खानेसे कफ विगाड़कर पहले ( ऊपर कहे हुए) की भाँति प्रदर उत्पन्न करता है ।
( च० चि० अ० २० श्लो० १४१ )
इसके अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
१. इसमें रक्त गिलगिला, पीला, भारी, चिकना, शीतल