भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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मूत्ररोग ।

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२. दिमागी काम करना और रजका घिगड़ना ।

३. पाचन शक्ति का कम होना ।

इस रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. बारबार पेशाब का आना ।

२. अत्यन्त निर्बलता और प्यास लगना ।

३. मूत्रमें सफेदी ।

यह रोग प्रायः चालीस वर्ष के लग भग होता है । निर्बल स्त्रियाँ इस रोग में अधिक फँसती हैं ।

५. मूत्रके साथ रक्तका आना ।

इसके तीन भेद और अनेक कारण हैं । (रति शास्त्र )

१. पहला भेद—कोई नस गुर्दे में खुल जाने या फट जानेसे । इसमें अनेक लक्षण होते हैं ।

१. साफ और पतला रक्त बिना पीड़ा के निकलता है ।

२. रगों के मुख खुलनेपर थोड़ा थोड़ा रक्त आता है ।

३. यदि रग फट गई हो तो अधिक रक्त निकलता है ।

४. रक्त रक्त जानेसे भित्स्वकी हड्डियोंकी ओर देर्य होता है ।

॥ दूसरा भेद—इसमें गुर्दा और कलेजा निर्बल होने और रक्त बन कर शरीर में ठीक ठीक न पहुंचने से या गुर्दे पर चोट लगने से ।

इसमें कई लक्षण होते हैं ।

१. मूत्र मांस धोवन के समान लाल हों जब कि कलेजे का विकार हो ।

२. गुर्दे के विकार से मूत्र सफेद और कुछ गाढ़ा हो ।

३. तीसरा भेद—इसमें मूत्रमार्ग के श्रवण की रगों में जखम हो जाते हैं । प्रायः मसाने की रगोंमें ऐसा जखम होता है ।