संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
10. रजो-धर्म और संयोग-शक्ति
रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
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(१०) रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
निरोग स्त्रियों में नियम के अनुसार रज हर महीने अरुंडोत्पादक कोष से होकर जलोत्पादक कोष में पहुंचता है और अरुंडाधार से बाहर होकर डिम्बकोष से गर्भाशय में आता है। ऐसे समय में गर्भाशय की भिल्ली मोटी पड़जाती है। इसकी धमनियों में खून अधिक जम जाता है। बलगमी या श्लैष्मिक गांठे (Mucous glands) बढ़जाती हैं। पतली धमनियों (Capillaries) और पतले सिरों से खून निकलने के कारण कहीं कहीं धमनियों फट जाती हैं। बलगम अधिक बनने लगता है और खून के साथ बाहर आता है। इसी को रजोधर्म कहते हैं। इस विषय में लोगों ने यही मान लिया है कि कन्यायें गरम देशों में गरमी के कारण जल्द और सर्द देशों में सर्दी के कारण देरसे रजस्वला होती हैं, परन्तु यह सिर्फ मान ही लेने की बात है। किसी भी देश की कन्याओं को देखिए, उनके रजस्वला होने का समय एक न मिलेगा। देशको जाने दीजिये एकही शहर को लीजिये जहाँ की सरदी गरमी वहाँ की रहने वाली कन्याओं को बराबर मिलती है वहाँ भी कन्याएँ एक समय में रजस्वला नहीं होतीं सर्द या गरम देशको किसी घर में एक ही माता पिता की दो कन्याओं को—जिनका पालन एक ही ढंग पर हुआ है—देखिए वे भी एक समय में रजवती नहीं होतीं इस से स्पष्ट है कि रजस्वला होने का समय देश की गरमी और सरदी पर निर्भर नहीं है ॥
जगत् प्रसिद्ध डाक्टर हालिक (Halliek) की राय है कि संसार की सब जातियों में कन्याएँ लगभग एक ही उमर में रजस्वला होती हैं यदि आफिका जैसे गरम देशकी
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सन्तति-शास्त्र ।
हवसी लड़की और यूरोप जैसे सर्व देशकी गोरी लड़की एक ही ढंग से परवरिश पावें, तो दोनों एक ही साथ ऋतुमती होंगी ।
(The origin of life )
डाक्टर रावर्टसन कहते हैं कि भारत और इङ्ग्लैंड दोनों जगह नौ नौ वर्ष की लड़कियाँ रजस्वला हुआ करती हैं या हो सकती हैं ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
डाक्टर हटक्रिन्स कहते हैं कि दो गोरी लड़कियाँ इतनी जल्दी रजस्वला हुईं कि वे ग्यारह वर्ष सात मास की आयु में माताएँ बन सकती थीं ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
टेलर साहबका कहना कि किसी भी देश में नौ वर्षकी लड़कियाँ गर्भवती हो सकती हैं, अर्थात् ऐसा हो जाना असम्भव नहीं है ।
(Medical jurisprudence by R Chevers )
एक बार इङ्ग्लैंड के मॅचेस्टर लाईगन अस्पताल में २४० लड़कियों की परीक्षा ली गई तो उनमें १० ग्यारह वर्ष की, १६ बारह वर्ष की, ५३ तेरह वर्ष की, ८५ चौदह वर्ष की, ६७ पन्द्रह वर्ष की और ७६ सोलह वर्ष की उम्र में रजस्वला हुईं ।
(Dr Fayer Calcutta European Female Orphan Asylum
इन बातों से पता चलता है कि सर्वत्र करीब २ एकही बात है । हमारे देशके लिये ऋषियों का मत है कि बारह वर्ष की अवस्था के पीछे रजोधर्म प्रारम्भ होता है और बुढ़ापे से शरीर निर्बल होने पर पचास वर्ष की अवस्था तक रहता है ।
( सु० श० ५० ३ श्लो० १० )
अब विचारणीय विषय यह है कि क्या कारण है कि हमारे देशमें कन्याएँ इस समय के पहले ही रजस्वला होजाती हैं ?
रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
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इस विषयमें माताओंका बहुत बड़ा दोष है। उनको इसका कुछ भी विचार नहीं है। कैसी शर्मकी बात है कि मूर्ख, निर्लज्ज और शौकके पंजेमें फँसी हुई स्त्रियाँ किसी बातका विचार न करती हुई बुरी संगत और बुरे कामोंसे कन्याओंको जल्दी सयानी बना लेती हैं। कन्याओंको सयानी बनानेके लिये ये बातें कारणभूत होती हैं—प्रेमकी बातें, मनमाना भोजन, दिल-चाहा शृंगार, हँसी-मजाककी बातें, वेहदे गाने, पेशाशीके वृत्तांत-से भरी हुई पुस्तकें, स्त्री और पुरुषोंकी परस्पर बात-चीतके रसभरे किस्से, शौकका सामान और निर्लज्ज स्त्रियोंका साथ। यही कारण है कि आजकल शहरोंमें कन्याएँ दस वर्षकी अवस्थामें रजवती होकर बारहवें वर्षमें पूर्ण युवतियाँ बन जाती हैं और उनके शरीरमें सारी बातें जवान स्त्रियोंकी सी देखनेमें आती हैं। यह तो भले घरानेकी अच्छे भले मानस और पद्वें रहनेवाली धनाढ्य स्त्रियोंकी दशा है, साधारण दशावाली स्त्रियाँ, जो पद्वीनशीन नहीं हैं, और भी बुरी दशामें होती हैं। बाजारू कन्याएँ (रिटियोंके यहाँ) तो इससे भी कहीं ज्यादा बुरी तरकीबोंसे जवान बनाई जाती हैं। उन दशाओंको याद करते हुए यही कहना पड़ता है कि हे भगवन् क्या होगा। यही कारण है कि देहातोंकी अपेक्षा शहरोंमें कन्याएँ बहुत जल्द रजवती हो जाती हैं, क्योंकि कन्याओंके कोमल चित्तको विगाड़कर जवानीकी गर्मी पैदा करनेके लिये शहरोंमें बहुत बड़े बड़े सामान प्रस्तुत रहते हैं।
जो लोग रजस्वला होनेका समय देशकी गरमी और सरदी पर निर्भर मानते हैं वे बङ्गाल देशका प्रमाण देते हैं। वहाँ गरमी विशेष होनेसे कन्याएँ जल्दी रजवती होती हैं। इस बातका हमने स्वयं अनुभव किया है कि बङ्गालमें कन्याएँ
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सन्तति-शास्त्र ।
इतनी जल्दी क्यों रजवती होती है ? जहाँतक पता चला, बात यह मालूम हुई कि वहाँका भोजन और व्यवहार ही इस रीतिका है । सबसे पहले भोजनको देखिये । वहाँ सब साधारणमें मछली खानेकी प्रथा है । क्या मछली कुछ कम कामोद्दीपक है ? क्या वहाँ स्त्रियोंका भ्रृंगार और प्रान्तोंसे कम है ? अतएव इस बातको मान लेना पड़ेगा कि जिन कारणोंसे कन्यायें जल्द रजवती होती हैं यद्गुलमें उनकी कमी नहीं है, मत्स्य अधिकता ही है । वे यद्गुली कि जो पञ्जाबके सर्व जिलों में बहुत दिनोंसे हैं, उनके यहाँ भी दस वर्ष की कन्यायें रजवती होती देखी गयी हैं । इससे साफ जाहिर है कि भोजन और खाने पीने आदिकी स्वतंत्रता ही पर रजस्वला होनेका समय निर्भर है ।
हम उन्हीं स्त्रियोंको निरोध मानेंगे कि जिनका ठीक समय पर रजोधर्म प्रारम्भ हुआ हो और हर महीनेमें ठीक ठीक होता हो । जो समय रजोधर्म प्रारम्भ होने का है ? उस समय कन्याओंके शरीरकी क्या कैसी होनी चाहिये ? उस समय वे खिलनेवाली फलीके समान फोमल, और चढ़ती हुई नदी के समान बढ़नेवाली होती हैं । ऐसे समयमें कन्याओंका अंग बढ़ता है, मनकी शक्तियोंका विकास होता है । अगड़े, फल-वाहिनी नली और गर्भाशय पूर्ण रूपसे खिलते हैं । ऐसे समयमें यदि कोई इनसे सन्तान उत्पन्न करनेकी इच्छा करे, तो उसके बराबर मूर्ख कौन होगा ।
समय और गरज दोनों बलवान हैं । सूखोंकी कौन कहे, अच्छे पड़े लिये, ताजे दिमागवालोंके इदयपर यह बात तोट रही है कि रजस्वला होते ही कन्याओंमें संयोग-शक्ति आ जाती है । पर यह बड़ी भारी भूल है । रजस्वला होना एक बात है
11. रजोधर्म के रोग
रजोधर्मके रोग ।
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और संयोग शक्ति कुछ दूसरी ही चीज है। रजस्वला होना बतलाता है कि अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशय अच्छी दशा में हैं और उनका विकास हो रहा है।
एक विद्वानकी राय है कि सोलह वर्ष के पहले स्त्री का शरीर संयोग करने योग्य नहीं होता, क्यों कि इसके पहिले रज कच्चे अण्ड और गर्भाशय से आता है। इनके पुष्ट होने का एक खास समय होता है। चारह वर्ष के बाद से इनका पुष्ट होना प्रारम्भ होता है और सोलह वर्ष की अवस्था तक अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशय तीनों पुष्ट होकर पूरे तौर से बढ़ जाते हैं। यदि इस अवस्था के पहिले संयोग किया जाय, तो ये तीनों बिगड़ जाते हैं। स्वार्थी पुरुष इन बातों पर ध्यान न देते हुए उत्तम सन्तान की इच्छा करते हैं। परिणाम यह होता है कि स्त्रियाँ अनेक रोगों में फँस कर जिन्दगी से हाथ धो बैठती हैं। अतएव यह शिक्षा मिलती है कि सोलह वर्ष से कम उमर वाली स्त्री से संयोग न करना चाहिये। रजस्वला होने के दिनों में मामूली स्त्री के—जो न बहुत निर्बल और न बहुत बलवती हो—उसके शरीर से दसतोला रज तो अवश्य ही निकलना चाहिये, परन्तु जो मोटी ताजी और अत्यन्त बलवती हैं उनके पन्द्रह तोला निकलना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं होता, तो समझना चाहिये कि कोई रोग अवश्य है। इन्हीं कारणों से प्रदर इत्यादि अनेक रोग उत्पन्न होकर बहुत बड़ी बड़ी बाधाएँ करते हैं।
( ११ ) रजोधर्म के रोग ।
शरीर एक फलकी भाँति है जिसप्रकार कल हजारों पुरजों के मिलाने से बनती है। उसी प्रकार हजारों नसों और इन्द्रियों से बनकर शरीर काम करता है। स्त्रियों के लिये रजस्वाव
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सन्तति-शास्त्र ।
शरीर का एक प्रधान धर्म है। इसके नियमपूर्वक होते रहने से स्त्रियाँ वही हुई नदी के समान स्वच्छ रहती हैं। जिस प्रकार नदी का बहाव रुक जाने पर उस में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, इसी प्रकार रजोधर्म विगड़ने पर स्त्रियों में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इनके अनेक भेद हैं।
१. रजोधर्माका न होना ।
इसके दो भेद हैं (१) विलकुल न होना (२) प्रारम्भ होकर चन्द हो जाना । (रतिशान्त)
१. प्रथम भेद—रजोधर्म का विलकुल न होना। इसके कई कारण हैं।
१. अपूर्व भगका होना (यह जन्म से होता है)
२. गर्भ अण्डका न होना (यह जन्म से होता है)
३. भग के मुख का चन्द होना (यह जन्म से होता है)
४. भगके मुखका सूर्यके मुखके समान अत्यन्त भारीक होना (यह जन्मसे होता है)
५. भगकी दोनों शीवारोंका आपसमें जुड़ा होना (यह जन्मसे ही होता है)
जिन स्त्रियाँ के ये व्याधियाँ होती हैं, वचपन में तो कुछ नहीं परन्तु ऋतु-धर्म के समयमें उन्हें बड़ा कष्ट होता है
२. दूसरा भेद—रजोधर्म प्रारम्भ होकर बंद हो जाना। इसके कई कारण हैं।
१. गर्भ, अण्ड, फलवाहिनी नली, भग और गर्भाशय के अनेक रोगों से।
२. रज और रक्त-विकार के अनेक रोगों से।
३. शोक, चिन्ता और भय इत्यादि के अनेक प्रकोपों से।
४. विषम स्वर, संभ्रहणी और श्रुतिसार से।
रजो-धर्मके रोग ।
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- ५. फेफड़े और गुरदेके अनेक रोगोंसे ।
- ६. सरीरमें खून कम हो जानेसे ।
- ७. शरीर दुर्बल और निर्वल होकर पीला पड़ जानेसे ।
- ८. तपेदिक और सोमरोगसे ।
- ९. प्रदर और उसके अनेक उपद्रवोंसे ।
- १०. आमाशयके अनेक रोगोंसे ।
- ११. शरीर का खून गाढ़ा होनेसे ।
- १२. रजसे संबंध रखनेवाले अवयवोंके विकारसे ।
- १३. भग मोटी होनेसे और उसके मार्ग रुद्धचित्त पड़ जाने तथा रगोंके द्रव जानेसे ।
- १४. अधिक बैठने और आराम करनेसे ।
- १५. बहुत चड़ा दुःख पहुँचनेसे कि जिसका आघात हृदय पर हो ।
- १६. दिमागी काम करने और अति मंथनसे ।
इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।
- १. पेट्का उभार जब कि रज इकट्ठा होकर न निकले ।
- २. हाथ, पाँव, पैर, कमर, नाभिमें दर्द और जलन उत्पन्न होना ।
- ३. रोग चढ़नेपर सारे पेटमें फोड़ेके समान दर्द ।
- ४. कुपत्त, सरदर्द, और घुमनी तथा आँखोंकी जलन ।
- ५. अण्डोंके दवानेपर दर्द होना ।
- ६. रगोंमें नीलापन ।
- ७. शरीरमें अत्यन्त सुस्ती ।
- ८. पेशाबकी अधिकता ।
- ९. शरीर भारी हो जाता है ।
- १०. पेट्को कड़ाई और रजसावके समयमें अत्यन्त पीड़ा ।
इस रोगमें सबसे पहले अण्डोंपर असर होता है । इसके
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सन्तति-शास्त्र ।
बाद फलवाहनी नली और गर्भाशयपर । इन तीनोंमें जब खुशकी आ जाती है, तो ये सिकुड़ जाते हैं । प्रारम्भमें कुछ नहीं ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, दशा चिगड़ती जाती है ।
२. रजका कम निकलना ।
इसके दो भेद हैं । (गतिदान्त्र)
१. प्रथम भेद—चार दिन बराबर रजसाव होकर थोड़ा निकलना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
१. रजका कम बनना ।
२. रजसे सम्बन्ध रखनेवाली नसों इत्यादिके विकारसे ।
३. गर्भाशयकी गरदनकी रुकावट ।
४. शरीरमें रक्तकी कमी ।
५. रजका गाढ़ा हो जाना ।
६. भ्रदर और कुण्डलसे ।
७. गर्भाशयके मुखका तंग होना ( यह निम्न प्रकारोंसे होता है )
१. जन्म से ही ।
२. गर्भाशयके मुखपर दाव इत्यादिके हो जानेसे ।
८. अण्ड, फलवाहनी नली और गर्भाशयकी किल्ली इत्यादिमें किसी तरहकी रुकावटसे ।
२. दूसरा भेद—एक ही दो दिन निकलकर बन्द हो जाना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. इसके भी वही कारण हैं जो ऊपर कहे गए हैं, परन्तु इस दशामें रोग बढ़ा हुआ समझना चाहिये ।
इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।
१. हाथ, पाँव, सर और कमरमें दर्द व जलन ।
२. आँखोंमें भारीपन और जलन ।
18. मूत्ररोग
रजो-धर्ममेंके रोग ।
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३. पेट्ट और कोयम भारतीयन ।
पेसी दशामें कष्ट होता है और नहीं भी होता । जिन स्त्रियोंमें रज कम होता है उनको कष्ट कम होता है; क्योंकि उनके तो रज ही कम है; परन्तु होते हुए न निकलनेसे बड़ी कठिनाई पड़ती है ।
३. कष्टरज
(१० क०)
१. रजका कष्टके साथ निकलना, यही कष्ट-रज है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशयमें विषाड । इससे, दूसरे रोग उत्पन्न हो जाना तथा किसी प्रकारकी रक्तावद ।
२. गर्भाशयके मुख और योनिमार्गमें शोथ इत्यादि ।
३. रजसे संबंध्य रसनेवाली नसाँ और रगों आदिकें किसी तरहका विकार ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. नामी और गर्भाशयके आसपास कठिन घावों के समान दर्द ।
२. काँखने और जोर देनेसे थोड़ासा रक्त निकलना ।
३. रक्त निकल जानेपर थोड़ी देरके लिये दर्द कम होकर फिर ज्योंका त्यों हो जाना ।
४. ऋतुके समयसे प्रायः आठ दिन पहले दर्दका प्रारम्भ होना ।
५. दर्दके साथ थोड़ा थोड़ासा खून निकलना ।
६. भ्रूवाशयमें जलन और दर्दका होना ।
७. नामीके नीचे दर्द और चोभसा मालूम होना ।
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सन्तति-शास्त्र ।
यह रोग जवान स्त्रियोंमें कम, परन्तु जिसकी जवानी ढल रही हो उनमें प्रिश्य पाया जाना है ।
४. वन्द्या स्त्रियों में कष्टरज । (शा० क्र०)
इसके अनेक कारण हैं ।
१. भीतरी अवयवोंकी कठोरता ।
२. अरुड, फलवाहिनी नली, गर्भाशय और भग तथा रजसे संवन्ध रयनेवाली नलों आदिका विकार ।
इसके अनेक लक्षण होते हैं ।
ऋतु प्रारम्भ होनेके प्रायः चार दिन पहलेहीसे ।
नाभिके नीचे और फसरमें उद्व उत्पन्न होकर ऋतुके चार छः दिन यादृक् रहता ।
२. प्यास अरुचि कृच्छ्र और हाथ पाँवोंमें जलन होना ।
३. सांसका जल्दी चलना और बेहोशी ।
५. अधिक रज निकलना ।
१. यह कई प्रकारसे होता है । (रति शास्त्र)
१. चार दिनोंमें ही अधिक रज निकलकर बन्द हो जाना ।
२. बराबर आठ-दस दिन या इससे भी अधिक दिनों तक निकलना ।
३. एक मासमें दो-तीन बार निकल जाना ।
४. बराबर गिरा करना या दो चार दिनोंके लिये बन्द हो जाना ।
५. कभी दो दो मास बराबर गिर कर बन्द हो जाना और फिर गिरने लगना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
(रतिशास्त्र)
रजोधर्मके रोग ।
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- १. ऐसे रोगोंसे कि जिनसे शरीरका रक्त पतला पड़ जावे ।
- २. गर्भाशयमें उन नसांका मुग्न खुल जाना कि जिससे रक्त आता है । यह नीचे लिखे कारणोंसे होता है ।
- १. जब कि छोटे कदकी स्त्री पूरे जवानके साथ संयोग करे तो दवाव और चोटके कारण तन्म खुल जानी हैं ।
- २. पुरुषकी लिंगेन्द्रिय बड़ी होनेके कारण नसोंमें आघात पहुँचकर उनका खुल जाना ।
- ३. कम उम्रवाली स्त्रीका पूरे बड़े जवान पुरुषमें संयोग द्वारा नसोंमें आघात पहुँचकर खुल जाना ।
- ३. स्त्रुतमें किसी प्रकारकी खराबी होने से ।
- ४. तपेदिक और शुरदेके विकारों से ।
- ५. शरीरमें स्त्रुत बहुत घनने से (यह मोटी ताजी स्त्रिया-में होता है) ।
- ६. ऐसे रोग कि जिनसे स्त्रुतमें गरमी उत्पन्न हो ।
- ७. स्त्रुतका गरम हो जाना, जैसे कुछ रोगका स्त्रुत ।
- ८. पांडुरोगके होनेसे ।
- ९. गर्भाशयका मुँह चौड़ा हो जानेसे ।
- १०. गर्भाशयकी गरदन वा गर्भाशय में परिवर्तनसे ।
- ११. अतिमैथुनसे ।
- १२. फेफड़ेके अनेक रोगोंसे ।
- १३. रक्त पतला हो जानेसे ।
- १४. मसानेमें सृजन आ जानेसे ।
- १५. अरुडोंमें शोथ होनेसे ।
- १६. अरुडोंके पास कर्हायर शोथ होनेसे ।
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सन्तति-शास्त्र ।
१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।
१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।
१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।
२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।
२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।
२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।
२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।
२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।
२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।
२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।
२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. रक्तका बहुत निकलना ।
२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।
३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।
४. आलस्य और मेहनत न होना ।
५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।
६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।
७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।
८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।
इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।
१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।
२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।
12. रजस्वलाके कर्तव्य
रजोध्यर्मके रोग ।
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३. हाथ पाँव और शरीर पर शोथ ।
४. शरीरमें वायुका फैल जाना ।
५. गर्भाशय और अण्डोंमें विशेष पीड़ा ।
६. प्यास और पेशाबका अधिक होना ।
७. दस्तकी रुकावट ।
ऐसी दशामें बहुत कम स्त्रियाँ बचती हैं । इसमें शरीरका सारा रक्त निकल जाता है । कभी कभी रक्तकी धार भी निकलती है, और कभी छिछड़ेदार रक्त निकलता है अतएव रोग प्रारंभ होते ही उपाय करना चाहिये ।
६. टीक समयपर रजस्वला न होना ।
इसके दो भेद हैं । (श० क०)
१. समयके पहिले होना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. स्तनका विगड़ जाना ।
२. रज टीक न बनना और शरीरमें रक्तकी कमी ।
३. अण्ड फलवाहिनी नली और गर्भाशयका रोगग्रस्त होना । इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. सुस्ती, सरदर्द, चेहरेपर रूखापन, थोड़े परिश्रममें रुकावट, छातीमें दर्द पेटमें पेंठन और आँखोंमें जलन ।
स्त्रियाँ इसे सामान्य रोग समझती हैं । प्रारम्भमें तो कुछ नहीं, परन्तु रोग बढ़नेपर बड़ी कठिनाई पड़ती है ॥
इस प्रकार रजोध्यर्मके अनेक रोगोंसे स्त्रियोंको अत्यन्त कष्ट होता है । अतएव स्तुत्यर्थमें जैसे ही कुछ विकार उत्पन्न हो तुरन्त उपाय करना चाहिये ।
( १२ ) रजस्वलाके कर्तव्य ।
स्त्रीका रजस्वला होना प्राकृतिक है । जिस प्रकार किसान-
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सन्तति-शास्त्र ।
को खेतीके लिये समय पाकर उत्तम खेत बनाना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको ऋतुकालमें अपनेको सुयोग्य बनाना पड़ता है । जिस खेतको किसानने नहीं कमाया, जिसकी कुछ परवाह नहीं की, उस खेतसे उत्तम फसिल पैदा करनेकी आशा करना मूर्खता नहीं, तो और क्या है ? इसी प्रकार जिन स्त्रियोंने ऋतु-कालमें अपनेको सुयोग्य नहीं बनाया, उनका उत्तम सन्तानकी इच्छा करना भी व्यर्थ है । जिस प्रकार खेतके भले बुने होनेका भार किसानकी मेहनतपर है, इसी तरह स्त्रियोंका अपने लिये सुयोग्य बना लेना उनके कर्तव्योंपर निर्भर है ।
यदि खेत उत्तम है, तो खेती भी मनमानी तैयार की जा सकती है, परन्तु निकाभमें खेतमें घरकी पूँजी (बीज)का धोटा ही रहता है । इसलिये भावी माताओंको ऋतुकालमें अपने कर्तव्योंसे न नूकना चाहिये ।
सन्तानके लिये माताका कर्तव्य रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है । सबसे पहला काम तो यह है कि रजवती होते ही उसे एकात्मवास करना चाहिये । यह हमारे देशकी पुरानी प्रथा है । इसका मतलब यह है कि—
रजोदर्शनके दिनोंमें माताका जैसा चित्त, चरित्र और व्यवहार होता है, उसी गुण-त्रोपके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )
अलग रहनेसे चित्त स्थिर रहता है, किसी तरहका विकार हृदयमें नहीं आता ।
माताका हृदय एक तसवीर खींचनेवाले यंत्रके समान है । जैसे यंत्रकी डिव्ही हटाते ही उसके सामनेवाली चीजोंका अफस शीशेपर आ जाता है, इसी प्रकार रजोदर्शनके समय माताके चित्त, चरित्र और व्यवहारसे हृदयपर पड़े हुए गुण-
21. मत्तानेके रोग
रजस्वलाके कर्तव्य ।
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द्रोप सन्तानमें आ जाते हैं। इसी लिये एकान्त-वासकी विधि कही गयी है। ऐसे समयमें स्त्रियाँ भोजनका ज़रा भी विचार नहीं करतीं। पुरानी रीतिके अनुसार वासी भोजन करती हैं, परन्तु यह आलस्य पैदा करता है। गरम भोजनसे रजवाहिनी नलियोंमें गरमी पहुँचती है, जिससे अधिक रज निकलनेका भय रहता है। अतएव ताज़ा भोजन ठंडा करके खाना चाहिये! गव्दा, कसैला, वादी, चरपरा और तैलसे बना हुआ भोजन हानि पहुँचाता है। इस लिये वैद्यकका मत है कि मीठा और जल्दी पचनेवाला भोजन करना उत्तम है। ( श० क० )
रजवतीको सिवा एकान्त-वासके और कुछ न करना चाहिये, क्योंकि वैद्यकका मत है कि “अद्यु समयमें दिनमें सोने-से बहुत सोने वाली, काजल लगानेसे श्रंथी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान करने, उवटन और चन्दन लगानेसे दुःखी, नैल लगानेसे कुशी, तारखुन काटनेसे खराब नाखूनोंवाली, दीड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों और काले ओठ वालू तथा काली जीभ वाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, तेज आवाज़ सुननेसे वहिरी, बालोमें कंधी करनेसे गंज रोगवाली, अधिक हवा खाने और कष्ट करनेसे मतवाली सन्तान उत्पन्न होती है।”
( सु० श० अ० २ श्लो० २३-२४ )
एक विद्वानकी राय है कि अश्लील गीत गानेसे बुढ़ी पुस्तकों-के पढ़ने, हँसी दिल्लागी, मज़ाक और बेहूदी बातें बफनेसे निर्लज्ज, परिश्रम करनेसे रोगी, सीनेसे नेत्र विकारवाली, पुरुष संयोग-से अनेक रोगयुक्त यदि कन्या हो तो वेश्या या गुप्त व्यभिचार वाली और यदि पुत्र हो तो वेश्याओंसे अदल प्रेम रखनेवाला वदचलन, शूद्धार करनेसे कामी, व्यभिचारी और शौकीन, भूठ बोलनेसे पारखंडी, क्रोध करनेसे दुष्ट, मांस खानेसे पापी, शराब
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मन्वर्ति-शास्त्र ।
पतिस्थ मनवाली, उपवास करनेमें पेटके रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।
यह विचार केवल रजोधर्मके तीन दिनोंके लिये ही है । इसका मतलब यह है कि रजवतीके हृदयमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न न होना चाहिये ।
धर्मशास्त्रका मत है कि रजवती पहले दिन चांडाली दूसरे दिन त्रासवानिनी, तीसरे दिन रजकी (धोविन) के नमन अथुद्ध रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है ।
( ध० मगूह )
यह बात विचार करने योग्य है कि जो स्त्री आज त्रासवाणी है, वह कल रजन्वला होनेपर चांडाली हो जावे । नहीं, धर्मप्रकरणमें यह बात इस कारण ले ली गयी है कि धर्मसमभ्कन ही रजवती किसीको स्पर्श न करे । इसी कारण तीन दिन अलग रहने और किसीको स्पर्श न करनेमें यह है कि रजवतीमें बड़ा लाभ तो किसीके स्पर्श न करनेमें नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल किसी प्रकारकी छूतका असर नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल हीन भी बहुत बड़ी होती है । कड़ाकेका जाड़ा पड़ रहा है । शतका समय है, वहजी एक पतली धोतीमें चँडी पिड़गिडा रही है । श्रावाम करनेके लिये परेडी चारपाई या तरता, चिल्लाने को चढाई और आठनेको एक पुराना कम्बल बहुत है । धर्मकी प्रेमियों और छूत अछूत पर जान देनेवाली स्त्रियोंका क्या यही धर्मकी मर्यादा है ? यदि रहे कि शरीरहीसे धर्म होता है । जब शरीर ही नहीं, तो धर्म कहाँसे होगा ? इसलिये धर्मशास्त्रने शरीरकी रक्षा करना ही परम धर्म माना है । ऐसी दशामें रजवतीको यदि सदी लग जावे तो अरुडे, फलवाहिनी नली और गर्भाश्रयमें अनेक रोग लिपट जाते हैं । परिणाम यह होता है स्त्रियाँ और बच्चोंसे मातापै सदाके लिये कि...
13. रजस्त्राताके कर्तव्य
रजस्त्राताके कर्तव्य ।
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जाती हैं। अतएव एक विद्वानकी राय है कि रजवतीको एकांत-वास करते हुए आरामके साथ तीन दिन हलका भोजन करके रहना चाहिये। ( रतिनात्त )
( १३ ) रजस्त्राताके कर्तव्य ।
स्नान करके स्त्री जब शुद्ध होती है, तो उस समयमें ईश्वरने स्त्रियोंकी आँखोंमें एक ऐसी शक्ति दी है कि वह जैसे स्त्री वा पुरुषका दर्शन करती है उसके हृदयपर उसका ऐसा प्रभाव पड़ता है कि जिससे उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है। वैद्यकका मत है कि स्नान करके नये कपड़े पहन, संगल पाठ और स्वस्तित्वान्न (यह वैदिक कर्म है)पूर्वक पतिका दर्शन करना चाहिये। इस लिये कि उसीके समान सन्तान हो। ( सु० श० अ० २ श्लो० ई० ) परन्तु यहाँ पर यह शंका होती है कि यदि पति कुरूप और अँगहीन हो, तो उसके दर्शनसे उत्तम सन्तान कैसे हो सकती है ?
इस विषयमें दूसरे आचार्यका यह मत है कि पति अथवा प्रियजन, देवर वा पुत्र इत्यादिके दर्शन करने चाहियें।
( भा० १० श्लो० ११ )
कोई आचार्य पतिके कुरूप होनेपर, देवर, पुत्र या ब्राह्मण का बालक, इनमें जो रूपवान हो उनके अथवा देवताकी सुन्दर प्रतिमाके दर्शन करनेका विधान करते हैं। ( श० ६० )
प्रायः लोग इस बातपर विश्वास नहीं करते परन्तु जहाँ तक यह बात देखी गई है, सत्य है।
( १ ) मेरे एक मित्रके साले अपनी बहनसे मिलने आये। वह रजवती थी और चौथा दिन था। स्नान करकेस्त्री अपने भाईसे उत्पन्न ही मिली। दैव-संयोग उसी स्नानसे
14. संयोगमें त्याज्य स्त्री और पुरुष
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सन्तति-शास्त्र ।
गर्भ रह गया। लड़का अपने मामाकी शकल सूतका उत्पन्न हुआ।
(२) एक सज्जनके यहाँ एक काला कलूटा कहार नौकर था। भाग्यवश वहूजीने स्नान करके कहारके ही दर्शन पाये। उसी रजोदर्शनसे गर्भ रह गया। पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ठीक उसी कहारके रंग रूपका था।
इन प्रत्यक्ष प्रमाणोंसे सिद्ध है कि इस विषयमें जो कुछ शास्त्रका मत है वह अक्षर-अक्षर-सत्य है। अतएव स्नान करके अत्यन्त सावधानीके साथ पति अथवा देवर, पुत्र इत्यादि जो मिय और सुन्दर हो, उसीका दर्शन करना चाहिये।
(१४) संयोगमें त्याज्य स्त्री और पुरुष ।
संयोग कोई मामूली बात नहीं है। यह किसी समय बहुत बड़े विचार और विधि-विधानके साथ किया जाता था। परन्तु आजकल इसकी दशा शोचनीय हो रही है। सबसे बड़ा कारण तो स्त्री और पुरुषोंकी अयोग्यता है। प्रायः देखा जाता कि स्त्री अथवा पुरुष रोगी हैं या भोजन किये थोड़ी ही देर हुई है, ऐसी दशाओंमें संयोग कर लिया जाता है। ऐसी असावधानियोंसे अनेक हानियाँ होती हैं कि जिनके अनेक कारण हैं। वैद्यकका मत है कि—
(१) रजस्वला होनेके पहले और उसके पीछे भी कम अवस्था वाली स्त्रीसे संयोग न करना चाहिं। क्योंकि ऐसे समयोंमें भीतरी अवयव पुष्ट नहीं होते, जिससे आगे होनेवाली सन्तान उत्पन्न होनेमें अनेक बाधाएँ पड़ती हैं। (श० क०)
(२) जिन्होंने अधिक भोजन किया हो, जो तुरन्त ही खा चुके हों, जिनका भोजन पचा न हो, प्यास लगी हो, जो शोक
15. वन्ध्या रोग
वन्द्या रोग ।
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चिन्तामें व्याकुल हों, जो बूढ़े या बूढ़ी हों, जो रोगी हों, जिनको पाखाने पेशाबकी हाजत हो, जो रजवती और पुरुषसे उमरमें बड़ी, तपेदिक, स्वास प्रमेह, प्रदर, गरमी, सूजाक का रोगी हों, जिनके कामदेव न जगा हों, शृङ्गार-रहित, नशेवाज, उन्मत्त और अति दुर्बल हों, उनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
(३) जो अपनेको मिय न हो, जिसके देखनेसे चित्त बिगड़ जाय, जिससे अनवन रहें, विरक्त, जो गुरुके खानदानकी हो दुष्ट योनिवाली और वन्दचलन हो, इनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
इस प्रकारके स्त्री और पुरुषोंसे संयोग न होना चाहिये; क्योंकि इससे अनेक रोग उत्पन्न होकर हानि पहुँचाते हैं।
(१५) वन्द्या रोग ।
हमारे देशमें वन्द्याओंके लिये लोगोंका अनोखा विचार है। जहाँ चार छः वर्ष वच्चा न हुआ तुरन्त स्त्रीको वन्द्या मान बैठते हैं और भाग्य भगवान्के भरोसे पड़े रहकर कुछ यल नहीं करते वैद्यकमें जितनी वन्द्याओंका जिक्र किया गया है, उनमेंसे कुछ ही ऐसी हैं कि जिनके सन्तान नहीं हो सकती, किन्तु औषधि करनेपर वन्द्याएँ निरोग हो सकती हैं। प्रायः लोग यही समझते हैं कि वन्द्याएँ आठ प्रकार की होती हैं और यही बात प्रसिद्ध भी है, परन्तु और दूसरे ग्रन्थोंके देखनेसे पता चलता है कि वन्द्याएँ अठारह प्रकारकी होती हैं। इनकी व्याख्या पृथक् पृथक् की जाती है। [ रतिशात्र ]
(१) जन्मवन्द्या—उसको कहते हैं जो गर्भ ही धारण न कर सके। जाँच करनेपर मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके
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सन्तति-शान्त ।
गर्भाशय ही नहीं होता । अतएव इसका इलाज नहीं हो सकता । क्योंकि इस रोग का सामान जन्म ही से रहता है । इस को पएडी भी कहते हैं ।
(२) काकवन्था—उसको कहते हैं कि जिसके एक ही सन्तान उत्पन्न होकर रह जाय, दूसरी न हो । जाँच करने पर यह मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंमें पहला बच्चा होनेके समय गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इस कारण दूसरी सन्तान नहीं होती । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।
(३) सूतवत्सा—उसको कहते हैं कि जिसके सन्तान उत्पन्न होती हो, परन्तु मर जाया करे । इस विषयमें धर्म-शास्त्रने यह माना है कि स्त्री पूर्व जन्मके पापोंसे सूतवत्सा होती है । यह बात गीता और वेदान्त-शास्त्रसे सिद्ध है कि मनुष्यको पूर्वजन्मका कर्म इस जन्ममें अवश्य भोगना पड़ता है । परन्तु इस विषयमें डाक्टोंका मत यह है कि जिस स्त्रीके बच्चे वारंवार मर जाते हैं, उसके दूध में एक प्रकारका विष होता है । मेरे एक मित्रके तीन बच्चे मर गए । चौथेको पैदा होते ही गायका दूध दिया गया, वह जिन्दा है; परन्तु पाचवाँ गायका दूध पिलाने पर भी मर गया । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।
(४) गर्भध्रावी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ धारण होकर गिर जाया करे । जाँच करनेसे मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशय के निकम्मे होनेसे होता है । यदि गर्भाशयमें थोड़ा विकार हो तो इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु रोग अधिक होनेपर औषधि भी व्यर्थ होती है । धर्म-शास्त्रने इस रोगको भी पूर्व जन्मके पापोंका फल माना है ।