भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

६४

सन्तति-शास्त्र ।

१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।

१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।

१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।

२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।

२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।

२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।

२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।

२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।

२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।

२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।

२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।

इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. रक्तका बहुत निकलना ।

२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।

३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।

४. आलस्य और मेहनत न होना ।

५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।

६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।

७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।

८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।

इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।

१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।

२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।