संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।
१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।
१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।
२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।
२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।
२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।
२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।
२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।
२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।
२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।
२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. रक्तका बहुत निकलना ।
२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।
३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।
४. आलस्य और मेहनत न होना ।
५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।
६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।
७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।
८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।
इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।
१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।
२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।