संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंरजोध्यर्मके रोग ।
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३. हाथ पाँव और शरीर पर शोथ ।
४. शरीरमें वायुका फैल जाना ।
५. गर्भाशय और अण्डोंमें विशेष पीड़ा ।
६. प्यास और पेशाबका अधिक होना ।
७. दस्तकी रुकावट ।
ऐसी दशामें बहुत कम स्त्रियाँ बचती हैं । इसमें शरीरका सारा रक्त निकल जाता है । कभी कभी रक्तकी धार भी निकलती है, और कभी छिछड़ेदार रक्त निकलता है अतएव रोग प्रारंभ होते ही उपाय करना चाहिये ।
६. टीक समयपर रजस्वला न होना ।
इसके दो भेद हैं । (श० क०)
१. समयके पहिले होना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. स्तनका विगड़ जाना ।
२. रज टीक न बनना और शरीरमें रक्तकी कमी ।
३. अण्ड फलवाहिनी नली और गर्भाशयका रोगग्रस्त होना । इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. सुस्ती, सरदर्द, चेहरेपर रूखापन, थोड़े परिश्रममें रुकावट, छातीमें दर्द पेटमें पेंठन और आँखोंमें जलन ।
स्त्रियाँ इसे सामान्य रोग समझती हैं । प्रारम्भमें तो कुछ नहीं, परन्तु रोग बढ़नेपर बड़ी कठिनाई पड़ती है ॥
इस प्रकार रजोध्यर्मके अनेक रोगोंसे स्त्रियोंको अत्यन्त कष्ट होता है । अतएव स्तुत्यर्थमें जैसे ही कुछ विकार उत्पन्न हो तुरन्त उपाय करना चाहिये ।
( १२ ) रजस्वलाके कर्तव्य ।
स्त्रीका रजस्वला होना प्राकृतिक है । जिस प्रकार किसान-
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