भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

को खेतीके लिये समय पाकर उत्तम खेत बनाना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको ऋतुकालमें अपनेको सुयोग्य बनाना पड़ता है । जिस खेतको किसानने नहीं कमाया, जिसकी कुछ परवाह नहीं की, उस खेतसे उत्तम फसिल पैदा करनेकी आशा करना मूर्खता नहीं, तो और क्या है ? इसी प्रकार जिन स्त्रियोंने ऋतु-कालमें अपनेको सुयोग्य नहीं बनाया, उनका उत्तम सन्तानकी इच्छा करना भी व्यर्थ है । जिस प्रकार खेतके भले बुने होनेका भार किसानकी मेहनतपर है, इसी तरह स्त्रियोंका अपने लिये सुयोग्य बना लेना उनके कर्तव्योंपर निर्भर है ।

यदि खेत उत्तम है, तो खेती भी मनमानी तैयार की जा सकती है, परन्तु निकाभमें खेतमें घरकी पूँजी (बीज)का धोटा ही रहता है । इसलिये भावी माताओंको ऋतुकालमें अपने कर्तव्योंसे न नूकना चाहिये ।

सन्तानके लिये माताका कर्तव्य रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है । सबसे पहला काम तो यह है कि रजवती होते ही उसे एकात्मवास करना चाहिये । यह हमारे देशकी पुरानी प्रथा है । इसका मतलब यह है कि—

रजोदर्शनके दिनोंमें माताका जैसा चित्त, चरित्र और व्यवहार होता है, उसी गुण-त्रोपके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )

अलग रहनेसे चित्त स्थिर रहता है, किसी तरहका विकार हृदयमें नहीं आता ।

माताका हृदय एक तसवीर खींचनेवाले यंत्रके समान है । जैसे यंत्रकी डिव्ही हटाते ही उसके सामनेवाली चीजोंका अफस शीशेपर आ जाता है, इसी प्रकार रजोदर्शनके समय माताके चित्त, चरित्र और व्यवहारसे हृदयपर पड़े हुए गुण-