संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
यह रोग जवान स्त्रियोंमें कम, परन्तु जिसकी जवानी ढल रही हो उनमें प्रिश्य पाया जाना है ।
४. वन्द्या स्त्रियों में कष्टरज । (शा० क्र०)
इसके अनेक कारण हैं ।
१. भीतरी अवयवोंकी कठोरता ।
२. अरुड, फलवाहिनी नली, गर्भाशय और भग तथा रजसे संवन्ध रयनेवाली नलों आदिका विकार ।
इसके अनेक लक्षण होते हैं ।
ऋतु प्रारम्भ होनेके प्रायः चार दिन पहलेहीसे ।
नाभिके नीचे और फसरमें उद्व उत्पन्न होकर ऋतुके चार छः दिन यादृक् रहता ।
२. प्यास अरुचि कृच्छ्र और हाथ पाँवोंमें जलन होना ।
३. सांसका जल्दी चलना और बेहोशी ।
५. अधिक रज निकलना ।
१. यह कई प्रकारसे होता है । (रति शास्त्र)
१. चार दिनोंमें ही अधिक रज निकलकर बन्द हो जाना ।
२. बराबर आठ-दस दिन या इससे भी अधिक दिनों तक निकलना ।
३. एक मासमें दो-तीन बार निकल जाना ।
४. बराबर गिरा करना या दो चार दिनोंके लिये बन्द हो जाना ।
५. कभी दो दो मास बराबर गिर कर बन्द हो जाना और फिर गिरने लगना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
(रतिशास्त्र)