संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें६०
सन्तति-शास्त्र ।
बाद फलवाहनी नली और गर्भाशयपर । इन तीनोंमें जब खुशकी आ जाती है, तो ये सिकुड़ जाते हैं । प्रारम्भमें कुछ नहीं ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, दशा चिगड़ती जाती है ।
२. रजका कम निकलना ।
इसके दो भेद हैं । (गतिदान्त्र)
१. प्रथम भेद—चार दिन बराबर रजसाव होकर थोड़ा निकलना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
१. रजका कम बनना ।
२. रजसे सम्बन्ध रखनेवाली नसों इत्यादिके विकारसे ।
३. गर्भाशयकी गरदनकी रुकावट ।
४. शरीरमें रक्तकी कमी ।
५. रजका गाढ़ा हो जाना ।
६. भ्रदर और कुण्डलसे ।
७. गर्भाशयके मुखका तंग होना ( यह निम्न प्रकारोंसे होता है )
१. जन्म से ही ।
२. गर्भाशयके मुखपर दाव इत्यादिके हो जानेसे ।
८. अण्ड, फलवाहनी नली और गर्भाशयकी किल्ली इत्यादिमें किसी तरहकी रुकावटसे ।
२. दूसरा भेद—एक ही दो दिन निकलकर बन्द हो जाना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. इसके भी वही कारण हैं जो ऊपर कहे गए हैं, परन्तु इस दशामें रोग बढ़ा हुआ समझना चाहिये ।
इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।
१. हाथ, पाँव, सर और कमरमें दर्द व जलन ।
२. आँखोंमें भारीपन और जलन ।