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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

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सन्तति-शास्त्र ।

बाद फलवाहनी नली और गर्भाशयपर । इन तीनोंमें जब खुशकी आ जाती है, तो ये सिकुड़ जाते हैं । प्रारम्भमें कुछ नहीं ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, दशा चिगड़ती जाती है ।

२. रजका कम निकलना ।

इसके दो भेद हैं । (गतिदान्त्र)

१. प्रथम भेद—चार दिन बराबर रजसाव होकर थोड़ा निकलना ।

इसके अनेक कारण हैं ।

१. रजका कम बनना ।

२. रजसे सम्बन्ध रखनेवाली नसों इत्यादिके विकारसे ।

३. गर्भाशयकी गरदनकी रुकावट ।

४. शरीरमें रक्तकी कमी ।

५. रजका गाढ़ा हो जाना ।

६. भ्रदर और कुण्डलसे ।

७. गर्भाशयके मुखका तंग होना ( यह निम्न प्रकारोंसे होता है )

१. जन्म से ही ।

२. गर्भाशयके मुखपर दाव इत्यादिके हो जानेसे ।

८. अण्ड, फलवाहनी नली और गर्भाशयकी किल्ली इत्यादिमें किसी तरहकी रुकावटसे ।

२. दूसरा भेद—एक ही दो दिन निकलकर बन्द हो जाना । इसके अनेक कारण हैं ।

१. इसके भी वही कारण हैं जो ऊपर कहे गए हैं, परन्तु इस दशामें रोग बढ़ा हुआ समझना चाहिये ।

इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।

१. हाथ, पाँव, सर और कमरमें दर्द व जलन ।

२. आँखोंमें भारीपन और जलन ।

18. मूत्ररोग

रजो-धर्ममेंके रोग ।

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३. पेट्ट और कोयम भारतीयन ।

पेसी दशामें कष्ट होता है और नहीं भी होता । जिन स्त्रियोंमें रज कम होता है उनको कष्ट कम होता है; क्योंकि उनके तो रज ही कम है; परन्तु होते हुए न निकलनेसे बड़ी कठिनाई पड़ती है ।

३. कष्टरज

(१० क०)

१. रजका कष्टके साथ निकलना, यही कष्ट-रज है । इसके अनेक कारण हैं ।

१. अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशयमें विषाड । इससे, दूसरे रोग उत्पन्न हो जाना तथा किसी प्रकारकी रक्तावद ।

२. गर्भाशयके मुख और योनिमार्गमें शोथ इत्यादि ।

३. रजसे संबंध्य रसनेवाली नसाँ और रगों आदिकें किसी तरहका विकार ।

इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. नामी और गर्भाशयके आसपास कठिन घावों के समान दर्द ।

२. काँखने और जोर देनेसे थोड़ासा रक्त निकलना ।

३. रक्त निकल जानेपर थोड़ी देरके लिये दर्द कम होकर फिर ज्योंका त्यों हो जाना ।

४. ऋतुके समयसे प्रायः आठ दिन पहले दर्दका प्रारम्भ होना ।

५. दर्दके साथ थोड़ा थोड़ासा खून निकलना ।

६. भ्रूवाशयमें जलन और दर्दका होना ।

७. नामीके नीचे दर्द और चोभसा मालूम होना ।

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सन्तति-शास्त्र ।

यह रोग जवान स्त्रियोंमें कम, परन्तु जिसकी जवानी ढल रही हो उनमें प्रिश्य पाया जाना है ।

४. वन्द्या स्त्रियों में कष्टरज । (शा० क्र०)

इसके अनेक कारण हैं ।

१. भीतरी अवयवोंकी कठोरता ।

२. अरुड, फलवाहिनी नली, गर्भाशय और भग तथा रजसे संवन्ध रयनेवाली नलों आदिका विकार ।

इसके अनेक लक्षण होते हैं ।

ऋतु प्रारम्भ होनेके प्रायः चार दिन पहलेहीसे ।

नाभिके नीचे और फसरमें उद्व उत्पन्न होकर ऋतुके चार छः दिन यादृक् रहता ।

२. प्यास अरुचि कृच्छ्र और हाथ पाँवोंमें जलन होना ।

३. सांसका जल्दी चलना और बेहोशी ।

५. अधिक रज निकलना ।

१. यह कई प्रकारसे होता है । (रति शास्त्र)

१. चार दिनोंमें ही अधिक रज निकलकर बन्द हो जाना ।

२. बराबर आठ-दस दिन या इससे भी अधिक दिनों तक निकलना ।

३. एक मासमें दो-तीन बार निकल जाना ।

४. बराबर गिरा करना या दो चार दिनोंके लिये बन्द हो जाना ।

५. कभी दो दो मास बराबर गिर कर बन्द हो जाना और फिर गिरने लगना ।

इसके अनेक कारण हैं ।

(रतिशास्त्र)

रजोधर्मके रोग ।

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  1. १. ऐसे रोगोंसे कि जिनसे शरीरका रक्त पतला पड़ जावे ।
  2. २. गर्भाशयमें उन नसांका मुग्न खुल जाना कि जिससे रक्त आता है । यह नीचे लिखे कारणोंसे होता है ।
    1. १. जब कि छोटे कदकी स्त्री पूरे जवानके साथ संयोग करे तो दवाव और चोटके कारण तन्म खुल जानी हैं ।
    2. २. पुरुषकी लिंगेन्द्रिय बड़ी होनेके कारण नसोंमें आघात पहुँचकर उनका खुल जाना ।
    3. ३. कम उम्रवाली स्त्रीका पूरे बड़े जवान पुरुषमें संयोग द्वारा नसोंमें आघात पहुँचकर खुल जाना ।
  3. ३. स्त्रुतमें किसी प्रकारकी खराबी होने से ।
  4. ४. तपेदिक और शुरदेके विकारों से ।
  5. ५. शरीरमें स्त्रुत बहुत घनने से (यह मोटी ताजी स्त्रिया-में होता है) ।
  6. ६. ऐसे रोग कि जिनसे स्त्रुतमें गरमी उत्पन्न हो ।
  7. ७. स्त्रुतका गरम हो जाना, जैसे कुछ रोगका स्त्रुत ।
  8. ८. पांडुरोगके होनेसे ।
  9. ९. गर्भाशयका मुँह चौड़ा हो जानेसे ।
  10. १०. गर्भाशयकी गरदन वा गर्भाशय में परिवर्तनसे ।
  11. ११. अतिमैथुनसे ।
  12. १२. फेफड़ेके अनेक रोगोंसे ।
  13. १३. रक्त पतला हो जानेसे ।
  14. १४. मसानेमें सृजन आ जानेसे ।
  15. १५. अरुडोंमें शोथ होनेसे ।
  16. १६. अरुडोंके पास कर्हायर शोथ होनेसे ।

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सन्तति-शास्त्र ।

१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।

१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।

१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।

२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।

२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।

२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।

२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।

२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।

२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।

२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।

२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।

इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. रक्तका बहुत निकलना ।

२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।

३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।

४. आलस्य और मेहनत न होना ।

५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।

६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।

७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।

८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।

इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।

१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।

२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।

12. रजस्वलाके कर्तव्य

रजोध्यर्मके रोग ।

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३. हाथ पाँव और शरीर पर शोथ ।

४. शरीरमें वायुका फैल जाना ।

५. गर्भाशय और अण्डोंमें विशेष पीड़ा ।

६. प्यास और पेशाबका अधिक होना ।

७. दस्तकी रुकावट ।

ऐसी दशामें बहुत कम स्त्रियाँ बचती हैं । इसमें शरीरका सारा रक्त निकल जाता है । कभी कभी रक्तकी धार भी निकलती है, और कभी छिछड़ेदार रक्त निकलता है अतएव रोग प्रारंभ होते ही उपाय करना चाहिये ।

६. टीक समयपर रजस्वला न होना ।

इसके दो भेद हैं । (श० क०)

१. समयके पहिले होना । इसके अनेक कारण हैं ।

१. स्तनका विगड़ जाना ।

२. रज टीक न बनना और शरीरमें रक्तकी कमी ।

३. अण्ड फलवाहिनी नली और गर्भाशयका रोगग्रस्त होना । इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. सुस्ती, सरदर्द, चेहरेपर रूखापन, थोड़े परिश्रममें रुकावट, छातीमें दर्द पेटमें पेंठन और आँखोंमें जलन ।

स्त्रियाँ इसे सामान्य रोग समझती हैं । प्रारम्भमें तो कुछ नहीं, परन्तु रोग बढ़नेपर बड़ी कठिनाई पड़ती है ॥

इस प्रकार रजोध्यर्मके अनेक रोगोंसे स्त्रियोंको अत्यन्त कष्ट होता है । अतएव स्तुत्यर्थमें जैसे ही कुछ विकार उत्पन्न हो तुरन्त उपाय करना चाहिये ।

( १२ ) रजस्वलाके कर्तव्य ।

स्त्रीका रजस्वला होना प्राकृतिक है । जिस प्रकार किसान-

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सन्तति-शास्त्र ।

को खेतीके लिये समय पाकर उत्तम खेत बनाना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको ऋतुकालमें अपनेको सुयोग्य बनाना पड़ता है । जिस खेतको किसानने नहीं कमाया, जिसकी कुछ परवाह नहीं की, उस खेतसे उत्तम फसिल पैदा करनेकी आशा करना मूर्खता नहीं, तो और क्या है ? इसी प्रकार जिन स्त्रियोंने ऋतु-कालमें अपनेको सुयोग्य नहीं बनाया, उनका उत्तम सन्तानकी इच्छा करना भी व्यर्थ है । जिस प्रकार खेतके भले बुने होनेका भार किसानकी मेहनतपर है, इसी तरह स्त्रियोंका अपने लिये सुयोग्य बना लेना उनके कर्तव्योंपर निर्भर है ।

यदि खेत उत्तम है, तो खेती भी मनमानी तैयार की जा सकती है, परन्तु निकाभमें खेतमें घरकी पूँजी (बीज)का धोटा ही रहता है । इसलिये भावी माताओंको ऋतुकालमें अपने कर्तव्योंसे न नूकना चाहिये ।

सन्तानके लिये माताका कर्तव्य रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है । सबसे पहला काम तो यह है कि रजवती होते ही उसे एकात्मवास करना चाहिये । यह हमारे देशकी पुरानी प्रथा है । इसका मतलब यह है कि—

रजोदर्शनके दिनोंमें माताका जैसा चित्त, चरित्र और व्यवहार होता है, उसी गुण-त्रोपके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )

अलग रहनेसे चित्त स्थिर रहता है, किसी तरहका विकार हृदयमें नहीं आता ।

माताका हृदय एक तसवीर खींचनेवाले यंत्रके समान है । जैसे यंत्रकी डिव्ही हटाते ही उसके सामनेवाली चीजोंका अफस शीशेपर आ जाता है, इसी प्रकार रजोदर्शनके समय माताके चित्त, चरित्र और व्यवहारसे हृदयपर पड़े हुए गुण-

21. मत्तानेके रोग

रजस्वलाके कर्तव्य ।

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द्रोप सन्तानमें आ जाते हैं। इसी लिये एकान्त-वासकी विधि कही गयी है। ऐसे समयमें स्त्रियाँ भोजनका ज़रा भी विचार नहीं करतीं। पुरानी रीतिके अनुसार वासी भोजन करती हैं, परन्तु यह आलस्य पैदा करता है। गरम भोजनसे रजवाहिनी नलियोंमें गरमी पहुँचती है, जिससे अधिक रज निकलनेका भय रहता है। अतएव ताज़ा भोजन ठंडा करके खाना चाहिये! गव्दा, कसैला, वादी, चरपरा और तैलसे बना हुआ भोजन हानि पहुँचाता है। इस लिये वैद्यकका मत है कि मीठा और जल्दी पचनेवाला भोजन करना उत्तम है। ( श० क० )

रजवतीको सिवा एकान्त-वासके और कुछ न करना चाहिये, क्योंकि वैद्यकका मत है कि “अद्यु समयमें दिनमें सोने-से बहुत सोने वाली, काजल लगानेसे श्रंथी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान करने, उवटन और चन्दन लगानेसे दुःखी, नैल लगानेसे कुशी, तारखुन काटनेसे खराब नाखूनोंवाली, दीड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों और काले ओठ वालू तथा काली जीभ वाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, तेज आवाज़ सुननेसे वहिरी, बालोमें कंधी करनेसे गंज रोगवाली, अधिक हवा खाने और कष्ट करनेसे मतवाली सन्तान उत्पन्न होती है।”

( सु० श० अ० २ श्लो० २३-२४ )

एक विद्वानकी राय है कि अश्लील गीत गानेसे बुढ़ी पुस्तकों-के पढ़ने, हँसी दिल्लागी, मज़ाक और बेहूदी बातें बफनेसे निर्लज्ज, परिश्रम करनेसे रोगी, सीनेसे नेत्र विकारवाली, पुरुष संयोग-से अनेक रोगयुक्त यदि कन्या हो तो वेश्या या गुप्त व्यभिचार वाली और यदि पुत्र हो तो वेश्याओंसे अदल प्रेम रखनेवाला वदचलन, शूद्धार करनेसे कामी, व्यभिचारी और शौकीन, भूठ बोलनेसे पारखंडी, क्रोध करनेसे दुष्ट, मांस खानेसे पापी, शराब

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मन्वर्ति-शास्त्र ।

पतिस्थ मनवाली, उपवास करनेमें पेटके रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

यह विचार केवल रजोधर्मके तीन दिनोंके लिये ही है । इसका मतलब यह है कि रजवतीके हृदयमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न न होना चाहिये ।

धर्मशास्त्रका मत है कि रजवती पहले दिन चांडाली दूसरे दिन त्रासवानिनी, तीसरे दिन रजकी (धोविन) के नमन अथुद्ध रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है ।

( ध० मगूह )

यह बात विचार करने योग्य है कि जो स्त्री आज त्रासवाणी है, वह कल रजन्वला होनेपर चांडाली हो जावे । नहीं, धर्मप्रकरणमें यह बात इस कारण ले ली गयी है कि धर्मसमभ्कन ही रजवती किसीको स्पर्श न करे । इसी कारण तीन दिन अलग रहने और किसीको स्पर्श न करनेमें यह है कि रजवतीमें बड़ा लाभ तो किसीके स्पर्श न करनेमें नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल किसी प्रकारकी छूतका असर नहीं पहुँचता । पग्लु आजकल हीन भी बहुत बड़ी होती है । कड़ाकेका जाड़ा पड़ रहा है । शतका समय है, वहजी एक पतली धोतीमें चँडी पिड़गिडा रही है । श्रावाम करनेके लिये परेडी चारपाई या तरता, चिल्लाने को चढाई और आठनेको एक पुराना कम्बल बहुत है । धर्मकी प्रेमियों और छूत अछूत पर जान देनेवाली स्त्रियोंका क्या यही धर्मकी मर्यादा है ? यदि रहे कि शरीरहीसे धर्म होता है । जब शरीर ही नहीं, तो धर्म कहाँसे होगा ? इसलिये धर्मशास्त्रने शरीरकी रक्षा करना ही परम धर्म माना है । ऐसी दशामें रजवतीको यदि सदी लग जावे तो अरुडे, फलवाहिनी नली और गर्भाश्रयमें अनेक रोग लिपट जाते हैं । परिणाम यह होता है स्त्रियाँ और बच्चोंसे मातापै सदाके लिये कि...

13. रजस्त्राताके कर्तव्य

रजस्त्राताके कर्तव्य ।

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जाती हैं। अतएव एक विद्वानकी राय है कि रजवतीको एकांत-वास करते हुए आरामके साथ तीन दिन हलका भोजन करके रहना चाहिये। ( रतिनात्त )

( १३ ) रजस्त्राताके कर्तव्य ।

स्नान करके स्त्री जब शुद्ध होती है, तो उस समयमें ईश्वरने स्त्रियोंकी आँखोंमें एक ऐसी शक्ति दी है कि वह जैसे स्त्री वा पुरुषका दर्शन करती है उसके हृदयपर उसका ऐसा प्रभाव पड़ता है कि जिससे उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है। वैद्यकका मत है कि स्नान करके नये कपड़े पहन, संगल पाठ और स्वस्तित्वान्न (यह वैदिक कर्म है)पूर्वक पतिका दर्शन करना चाहिये। इस लिये कि उसीके समान सन्तान हो। ( सु० श० अ० २ श्लो० ई० ) परन्तु यहाँ पर यह शंका होती है कि यदि पति कुरूप और अँगहीन हो, तो उसके दर्शनसे उत्तम सन्तान कैसे हो सकती है ?

इस विषयमें दूसरे आचार्यका यह मत है कि पति अथवा प्रियजन, देवर वा पुत्र इत्यादिके दर्शन करने चाहियें।

( भा० १० श्लो० ११ )

कोई आचार्य पतिके कुरूप होनेपर, देवर, पुत्र या ब्राह्मण का बालक, इनमें जो रूपवान हो उनके अथवा देवताकी सुन्दर प्रतिमाके दर्शन करनेका विधान करते हैं। ( श० ६० )

प्रायः लोग इस बातपर विश्वास नहीं करते परन्तु जहाँ तक यह बात देखी गई है, सत्य है।

( १ ) मेरे एक मित्रके साले अपनी बहनसे मिलने आये। वह रजवती थी और चौथा दिन था। स्नान करकेस्त्री अपने भाईसे उत्पन्न ही मिली। दैव-संयोग उसी स्नानसे

14. संयोगमें त्याज्य स्त्री और पुरुष

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सन्तति-शास्त्र ।

गर्भ रह गया। लड़का अपने मामाकी शकल सूतका उत्पन्न हुआ।

(२) एक सज्जनके यहाँ एक काला कलूटा कहार नौकर था। भाग्यवश वहूजीने स्नान करके कहारके ही दर्शन पाये। उसी रजोदर्शनसे गर्भ रह गया। पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ठीक उसी कहारके रंग रूपका था।

इन प्रत्यक्ष प्रमाणोंसे सिद्ध है कि इस विषयमें जो कुछ शास्त्रका मत है वह अक्षर-अक्षर-सत्य है। अतएव स्नान करके अत्यन्त सावधानीके साथ पति अथवा देवर, पुत्र इत्यादि जो मिय और सुन्दर हो, उसीका दर्शन करना चाहिये।

(१४) संयोगमें त्याज्य स्त्री और पुरुष ।

संयोग कोई मामूली बात नहीं है। यह किसी समय बहुत बड़े विचार और विधि-विधानके साथ किया जाता था। परन्तु आजकल इसकी दशा शोचनीय हो रही है। सबसे बड़ा कारण तो स्त्री और पुरुषोंकी अयोग्यता है। प्रायः देखा जाता कि स्त्री अथवा पुरुष रोगी हैं या भोजन किये थोड़ी ही देर हुई है, ऐसी दशाओंमें संयोग कर लिया जाता है। ऐसी असावधानियोंसे अनेक हानियाँ होती हैं कि जिनके अनेक कारण हैं। वैद्यकका मत है कि—

(१) रजस्वला होनेके पहले और उसके पीछे भी कम अवस्था वाली स्त्रीसे संयोग न करना चाहिं। क्योंकि ऐसे समयोंमें भीतरी अवयव पुष्ट नहीं होते, जिससे आगे होनेवाली सन्तान उत्पन्न होनेमें अनेक बाधाएँ पड़ती हैं। (श० क०)

(२) जिन्होंने अधिक भोजन किया हो, जो तुरन्त ही खा चुके हों, जिनका भोजन पचा न हो, प्यास लगी हो, जो शोक

15. वन्ध्या रोग

वन्द्या रोग ।

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चिन्तामें व्याकुल हों, जो बूढ़े या बूढ़ी हों, जो रोगी हों, जिनको पाखाने पेशाबकी हाजत हो, जो रजवती और पुरुषसे उमरमें बड़ी, तपेदिक, स्वास प्रमेह, प्रदर, गरमी, सूजाक का रोगी हों, जिनके कामदेव न जगा हों, शृङ्गार-रहित, नशेवाज, उन्मत्त और अति दुर्बल हों, उनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )

(३) जो अपनेको मिय न हो, जिसके देखनेसे चित्त बिगड़ जाय, जिससे अनवन रहें, विरक्त, जो गुरुके खानदानकी हो दुष्ट योनिवाली और वन्दचलन हो, इनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )

इस प्रकारके स्त्री और पुरुषोंसे संयोग न होना चाहिये; क्योंकि इससे अनेक रोग उत्पन्न होकर हानि पहुँचाते हैं।

(१५) वन्द्या रोग ।

हमारे देशमें वन्द्याओंके लिये लोगोंका अनोखा विचार है। जहाँ चार छः वर्ष वच्चा न हुआ तुरन्त स्त्रीको वन्द्या मान बैठते हैं और भाग्य भगवान्के भरोसे पड़े रहकर कुछ यल नहीं करते वैद्यकमें जितनी वन्द्याओंका जिक्र किया गया है, उनमेंसे कुछ ही ऐसी हैं कि जिनके सन्तान नहीं हो सकती, किन्तु औषधि करनेपर वन्द्याएँ निरोग हो सकती हैं। प्रायः लोग यही समझते हैं कि वन्द्याएँ आठ प्रकार की होती हैं और यही बात प्रसिद्ध भी है, परन्तु और दूसरे ग्रन्थोंके देखनेसे पता चलता है कि वन्द्याएँ अठारह प्रकारकी होती हैं। इनकी व्याख्या पृथक् पृथक् की जाती है। [ रतिशात्र ]

(१) जन्मवन्द्या—उसको कहते हैं जो गर्भ ही धारण न कर सके। जाँच करनेपर मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके

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सन्तति-शान्त ।

गर्भाशय ही नहीं होता । अतएव इसका इलाज नहीं हो सकता । क्योंकि इस रोग का सामान जन्म ही से रहता है । इस को पएडी भी कहते हैं ।

(२) काकवन्था—उसको कहते हैं कि जिसके एक ही सन्तान उत्पन्न होकर रह जाय, दूसरी न हो । जाँच करने पर यह मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंमें पहला बच्चा होनेके समय गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इस कारण दूसरी सन्तान नहीं होती । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।

(३) सूतवत्सा—उसको कहते हैं कि जिसके सन्तान उत्पन्न होती हो, परन्तु मर जाया करे । इस विषयमें धर्म-शास्त्रने यह माना है कि स्त्री पूर्व जन्मके पापोंसे सूतवत्सा होती है । यह बात गीता और वेदान्त-शास्त्रसे सिद्ध है कि मनुष्यको पूर्वजन्मका कर्म इस जन्ममें अवश्य भोगना पड़ता है । परन्तु इस विषयमें डाक्टोंका मत यह है कि जिस स्त्रीके बच्चे वारंवार मर जाते हैं, उसके दूध में एक प्रकारका विष होता है । मेरे एक मित्रके तीन बच्चे मर गए । चौथेको पैदा होते ही गायका दूध दिया गया, वह जिन्दा है; परन्तु पाचवाँ गायका दूध पिलाने पर भी मर गया । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।

(४) गर्भध्रावी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ धारण होकर गिर जाया करे । जाँच करनेसे मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशय के निकम्मे होनेसे होता है । यदि गर्भाशयमें थोड़ा विकार हो तो इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु रोग अधिक होनेपर औषधि भी व्यर्थ होती है । धर्म-शास्त्रने इस रोगको भी पूर्व जन्मके पापोंका फल माना है ।

बन्ध्या रोग ।

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(५) गल्हगर्भा—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ रहकर गल्ह जावे और बढ़ न सके। इस विषयमें जाँच करने से मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशयके विकार से होता है। खास कर उस स्त्री को कि जिसको 'सरतान रहम' अर्थात् गर्भाशय में कीड़े पैदा हो गए हों। 'सरतान रहमका' मत हकीमाका है अथवा उस स्त्री को होता है, जिस स्त्री की योनि अचरणा हो। अचरणा योनि उसको कहते हैं कि जिस में साफ न करने के कारण छोटे छोटे कीड़े पड़ गए हों और खुजली उत्पन्न होती हो। (च० चि० ३० ३७ श्लो० ११) ऐसे रोगी के होने पर गर्भाशय नष्ट होकर गर्भ गल्हकर गिर जाया करता है। इस रोग का दूसरा कारण गर्भाशयकी गर्मी है। गर्भाशय की बढ़ी हुई गर्मी गर्भ को गला देती है। तीसरा कारण अत्यन्त बढ़ा हुआ गर्मी और सूजाक का प्रकोप है कि जिस से बच्चे का रक्त विगड़ जाता है और गल्ह कर गिर पड़ता है। बड़े हुए कारणोंमें औषधि व्यर्थ होती है।

(६) कन्यापत्या—उसको कहते हैं कि जिस के कन्याएँ ही उत्पन्न हों। जाँच करने से मालूम हुआ है ऐसी स्त्रियाँ वही होती हैं कि जिनके दहिने और का अरुड नहीं होता या निकम्मा हो जाता है। क्यों कि स्त्री के दहिने अरुड से निकले हुए रज द्वारा पुत्र होता है। जब दहिना अरुड ही नहीं है तो पुत्र हो कैसे? अतएव ऐसी दशा में भी औषधि व्यर्थ है।

(७) भूठगर्भा—उसको कहते हैं कि गर्भ रह कर उस की बुद्धि न हो, वैसा ही रह जावे और दूसरा गर्भ भी न रहे। भूठगर्भ वह है कि जिस में बच्चे के स्थान में माँस का लोथड़ा हो। इसका कारण यह है कि जब

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सन्तति-शास्त्र ।

चौथे दिन स्नान करके स्त्री स्पर्श में पुत्र्य संयोग करे या दो स्त्रियाँ आपस में स्त्री पुत्र्य की भाँति संयोग करें तो एककी योनि से वीर्य निकल कर जब दूसरी की योनि में पहुँच जाय तो वह रज से मिलकर गर्भ में पिंड बना देता है । इसे गर्भाका मांस-पिंड कहते हैं ।

( सु० श० अ० २ श्लोक ५१ मे ५३ )

इस विषय में एक विद्वान् की राय है कि सृष्टगर्भ गृहने पर फिर अस्ली गर्भ नहीं रहता । ( श० क० )

डाक्टर लोग उसको ( Falsc pregnancy ) कहते हैं और इसका कारण रज-विकार मानते हैं । डाक्टरी मत के अनुसार उपचार हो सकता है ।

(८) रजोहीना—उसको कहते हैं कि जो रजस्वला हो न हो । इस विषय में जांच करने से मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके गर्भ-अण्ड ही नहीं होते । ऐसी दशा में सन्तान भला कैसे हो सकता है । अतएव औषधि करना व्यर्थ है ।

(९) मेही—उस को कहते हैं कि जिसके शरीर में चरवी अत्यन्त बढ़ गई हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं हो सकती कि चरवी बढ़ने से गर्भाशय निकम्मा हो जाता है । चरवी गर्भकोष को विगाड़ देती है और मुख सकुचित हो जाता है । इसकी औषधि हो सकती है ।

(१०) अतिसूला—उसको कहते हैं जो अत्यन्त मोटी हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं होती कि उनका गर्भ-अण्ड विगाड़ जाता है और मोटाई के कारण लिंगेंद्रिय गर्भाशय के मुख तक न पहुँच कर वीच में ही रह जाती है । अतएव वीर्य भी वहाँ तक नहीं पहुँच सकता । इसकी औषधि हो सकती है ।

(११) नष्ट कोष्ठी—उसको कहते हैं कि जिसका कोष्ठ अर्थात्

वन्द्या रोग ।

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गर्भाशय नष्ट हो गया हो और इस कारण गर्भ न रहता हो । इसके तीन भेद हैं—

(१) स्त्री का थोड़ी अवस्था में पुरुष से संयोग हो जाना । ऐसा होने पर गर्भाशय नष्ट और धातु क्षीण हो जाती है । एक विद्वान् की राय है ऐसा होने पर गर्भाशय दग्ध हो जाता है। (श० क०)

इसमें सन्देह नहीं कि थोड़ी अवस्था में संयोग हो जाने से गर्भाशय और गर्भश्राव इतने निर्बल और निकम्मे होजाते हैं कि वे अपना काम नहीं कर सकते । इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु इसे लग भग असाध्य ही समझना चाहिये ।

२. यह कि अनेक रोगोंके कारण गर्भाशय का नष्ट हो जाना, इसमें बहुत से रोगों की औषधि हो सकती है और बहुतों की नहीं ।

३. योनि-रोग कि जिससे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इसमें भी कुछ रोगों की औषधि हो सकती है, कुछ की नहीं । जब योनिरोग से गर्भाशय नष्ट हुआ हो, तो योनि और गर्भाशय दोनों की चिकित्सा होनी चाहिये ।

(१२) बलधर्मी—उसको कहते हैं कि जिसको निर्बलताके कारण गर्भ न रहता हो । ऐसी स्त्रियाँ बही होती हैं कि जो अत्यन्त मैथुनप्रिय हैं और जिनके शरीर में रक्त नहीं है । इनकी औषधि हो सकती है, परन्तु बहुत कठिनाई से ।

(१३) शकसयोगिता—उसको कहते हैं कि रजस्वला होने के पहले ही जिसका पुरुष से संयोग हो गया हो । ऐसी स्त्री का गर्भाशय दग्ध होकर सिकुड़ जाता है और फिर गर्भ नहीं रहता । इसी कारण सुधरने लिखा है कि

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सन्तति-शास्त्र ।

सोलह वर्ष से पहले पुरुष से संयोग न होना चाहिये । ऐसी दशा में श्रोवधियां प्रायः व्यर्थ होती हैं, परन्तु डाकुर लोग साहस रखते हैं ।

(१४) वामिनी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भाशय में पड़ुचा हुआ वीर्य छू या सात दिनों में बाहर निकल आचे । यह रोग गर्भाशय के विकार से होता है, खास कर उस समय में जब कि गर्भाशय का मुख चौड़ा हो गया हो, अथवा गर्भाशय के दूसरे रोगों से । इसकी श्रोवधि हो सकती है ।

(१५) सूचीमुखी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भाशयका मुख बहुत छोटा हो, जिससे वीर्य भीतर न जा सके । यह रोग जन्म से होता है । इसकी श्रोवधि करना व्यर्थ है ।

(१६) रक्तवावी—उसको कहते हैं कि जिसके हमेशा रक्तगिरा करता हो । ऐसी दशामें गर्भ नहीं रहता । यह कई प्रकार से होता है ।

१. रक्त और पिस्त के विगड़ जाने से ।

२. छोटी अवस्थावाली स्त्रीका पूरे जवान पुरुष के समागमके कारण गर्भाशय और फलवाहिनी नली की किसी रगके फट जानेसे ।

यह रोग कठिनाई से अच्छा हो सकता है परन्तु अच्छे होने पर सन्तान होने की वाबत ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । होना और न होना दोनों समभव है । श्रोवधि का प्रयोग कठिन ही है ।

(१७) स्त्री—उसको कहते हैं कि जिसके योनिसे सफेद या रगतदार पतला या लुवाबदार पदार्थ निकला करे यह कई कारणों से होता है ।

वन्ध्या रोग ।

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१. वात, पित्त और कफके प्रकोपसे ।

२. प्रदर रोगसे ।

३. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।

इसकी औपधि हो सकती है, परन्तु कव, जबकि केवल साव ही हो। जब गर्भाशयमें मस्ते और गाँठसवन्धी रोग होगा, तब प्रारम्भमें कुछ कठिनाई और रोग बढ़नेमें अत्यन्त कठिनाता होगी। इसे प्रायः असाध्य ही जानना चाहिये।

( १८ ) शृण्वी—इस प्रकारकी वन्ध्याके दो भेद होते हैं।

१. वह कि जिसके गर्भाशयमें वीर्य पहुँचकर जल जावे।

ऐसी दशामें रज निकलनेमें अत्यन्त जलन जान पड़ती है। रज काला और गाढ़ा होता है। गर्मी बहुत मालूम होती है। यह रोग उस समय होता है जब कि गर्भाशयकी गर्मी अत्यन्त बढ़ गई हो। इसकी औपधि हो सकती है।

२. वह कि जब गर्भाशयमें वीर्य सूख जावे। ऐसी दशामें गर्मी अधिक जान पड़ती है। योनि और गर्भाशय सूखे रहते हैं। जलन और गर्मी अधिक होती है। यह भी अत्यन्त गर्मीके बढ़नेसे होता है। इसकी औपधि हो सकती है।

इन प्रकार अटारह तरहकी वन्ध्याओंमें सबको पूर्ण वन्ध्या न समझना चाहिये। जिनका वन्ध्यत्व औपधिसे छूट सकता है, उनके लिये औपधि अवश्य करनी चाहिये। विद्वान् लोग प्रायः उन्हीं स्त्रियोंको वन्ध्या मानते हैं कि जिनके गर्भ उत्पन्न करनेका अवयव ही न हो। इस प्रकार जाँच करके यल्ल करना आवश्यक है।

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सन्तति-शास्त्र ।

(१६) मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें

चरबीका बढ़ना ।

शरीरमें चर्बीके बढ़नेको मेद वृद्धि कहते हैं। यह रोग स्त्रियोंको विशेष रीतिसे होता है, खासकर उनको जो वैठी रहती हैं। और कुछ काम नहीं करतीं या जिन्हें उत्तमोत्तम भोजन मिलता है। वैद्यकका मत है कि दिनोंमें सोनेसे, कफ उत्पन्न करनेवाले चिकने मोटे पदार्थों के सेवन करनेसे, भोजनका रस मधुर होकर मेदको बढ़ाता है। बढ़ती हुई चर्बीका असर शरीरमें हर जगह होता है। इस कारण रसवाही शिराओंका रास्ता बंद हो जाता है। ऐसी दशामें हड्डी, मज्जा और चीन्य पुष्ट न होकर फेंचल चर्बी ही बढ़ती है। अतएव मनुष्य सुकुमार और आलसी होकर सच कामोंमें पीछपहीन हो जाता है।

( श० क० )

स्वर्वास रोग, व्यास, निद्रा, आलस्य, भूख, पसीना और दुर्गंध ये बातें चर्बी बढे हुए मनुष्यमें अवश्य होती हैं। प्रायः देखा गया है कि ऐसे रोगी खाते बहुत हैं। शरीरके सच स्थानों में तो चर्बी बढ़ती ही है, परन्तु पेट, नितम्ब, छाती और पिंड-लियोंमें अधिक, किन्तु ताकत कम हो जाती है। स्त्रियोंमें गर्भाशयका मुँह मोटा पड जाता है और चर्बीसे मिश्रित कोई पदार्थ उस जगह रहता है। चर्बीके कारण योनि संकुचित अर्थात् सक्की पड जाती है ऐसी स्त्रियोंमें स्नान ठीक ठीक नहीं बनता। यही कारण है कि सबसे पहले रजका चिगाड होता है। जब स्त्रुय अच्छी तरह चर्बी बढ़नेमें छा जाती है, तो

16. मेंद-बुद्धि अर्थात् शरीर में चरबी का बढ़ना

मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें चरबीका बढ़ना ।

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रज वन्द हो जाता है । कभी कभी निकल भी आता है । कभी दो दो तीन तीन मास तक नहीं होता । अतएव गर्भ का सन्देह हो जाता है । इसका कारण गर्भाशय के मुखकी संकीर्णता भी है । प्रायः ऐसी दशामें गर्भाशय में रक्त जम भी जाता है, जिस से अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । गर्भाशय में रज-एकत्र होने और चर्बी के प्रकोप से दूषित होने के कारण रज-जन्तुओं को हानि पहुँचती है । ऐसे स्त्री और पुरुष संयोग नहीं कर सकते । मैथुन में इनका ढम उखड़ जाता है, देह शिथिल हो जाती है, पसीना निकलने लगता है, ब्रह्मराहट् प्रारम्भ हो जाती है, स्वार्स चलने लगता है, व्यास लग आनी है और उठना बैठना कठिन हो जाता है ।

लोग इसको अच्छा समझते हैं कि शरीर मोटा रहे, परन्तु यह बहुत बुरा रोग है । ऐसे स्त्री पुरुष कि जिनका शरीर चर्बी का स्थान हो रहा है, कभी सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते । क्यों कि गर्भाशय चर्बी के विकार से चिंकना होने पर वीर्य ग्रहण नहीं करता और पुरुष के मोटे होने पर इन्द्रिय निश्चित स्थान पर वीर्य नहीं पहुँचा सकती । दोनों में मेद-वृद्धि होनेसे सन्तान नहीं होती, लेकिन उन मोटे स्त्री पुरुषों से सन्तान होती है कि जिनका शरीर रक्त से मोटा हो गया है और रजो-धर्म में विगाड़ और गर्भाशय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है । (रतिशास्त्र)

मोटापन प्रारम्भ होते ही यह निश्चय करना चाहिये कि शरीर रक्त के कारण मोटा हो रहा है या चर्बी से । यदि चर्बी से हो रहा हो, तो ऐसे पदार्थ, जो चर्बी बढ़ाने में सहायक हों, तुरन्त छोड़ देने चाहिये । ऐसी अवस्था में किसी प्रकार का परिश्रम प्रारम्भ करके आराम छोड़ देना परम हितकर है ।