भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

चौथे दिन स्नान करके स्त्री स्पर्श में पुत्र्य संयोग करे या दो स्त्रियाँ आपस में स्त्री पुत्र्य की भाँति संयोग करें तो एककी योनि से वीर्य निकल कर जब दूसरी की योनि में पहुँच जाय तो वह रज से मिलकर गर्भ में पिंड बना देता है । इसे गर्भाका मांस-पिंड कहते हैं ।

( सु० श० अ० २ श्लोक ५१ मे ५३ )

इस विषय में एक विद्वान् की राय है कि सृष्टगर्भ गृहने पर फिर अस्ली गर्भ नहीं रहता । ( श० क० )

डाक्टर लोग उसको ( Falsc pregnancy ) कहते हैं और इसका कारण रज-विकार मानते हैं । डाक्टरी मत के अनुसार उपचार हो सकता है ।

(८) रजोहीना—उसको कहते हैं कि जो रजस्वला हो न हो । इस विषय में जांच करने से मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके गर्भ-अण्ड ही नहीं होते । ऐसी दशा में सन्तान भला कैसे हो सकता है । अतएव औषधि करना व्यर्थ है ।

(९) मेही—उस को कहते हैं कि जिसके शरीर में चरवी अत्यन्त बढ़ गई हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं हो सकती कि चरवी बढ़ने से गर्भाशय निकम्मा हो जाता है । चरवी गर्भकोष को विगाड़ देती है और मुख सकुचित हो जाता है । इसकी औषधि हो सकती है ।

(१०) अतिसूला—उसको कहते हैं जो अत्यन्त मोटी हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं होती कि उनका गर्भ-अण्ड विगाड़ जाता है और मोटाई के कारण लिंगेंद्रिय गर्भाशय के मुख तक न पहुँच कर वीच में ही रह जाती है । अतएव वीर्य भी वहाँ तक नहीं पहुँच सकता । इसकी औषधि हो सकती है ।

(११) नष्ट कोष्ठी—उसको कहते हैं कि जिसका कोष्ठ अर्थात्