संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंवन्द्या रोग ।
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गर्भाशय नष्ट हो गया हो और इस कारण गर्भ न रहता हो । इसके तीन भेद हैं—
(१) स्त्री का थोड़ी अवस्था में पुरुष से संयोग हो जाना । ऐसा होने पर गर्भाशय नष्ट और धातु क्षीण हो जाती है । एक विद्वान् की राय है ऐसा होने पर गर्भाशय दग्ध हो जाता है। (श० क०)
इसमें सन्देह नहीं कि थोड़ी अवस्था में संयोग हो जाने से गर्भाशय और गर्भश्राव इतने निर्बल और निकम्मे होजाते हैं कि वे अपना काम नहीं कर सकते । इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु इसे लग भग असाध्य ही समझना चाहिये ।
२. यह कि अनेक रोगोंके कारण गर्भाशय का नष्ट हो जाना, इसमें बहुत से रोगों की औषधि हो सकती है और बहुतों की नहीं ।
३. योनि-रोग कि जिससे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इसमें भी कुछ रोगों की औषधि हो सकती है, कुछ की नहीं । जब योनिरोग से गर्भाशय नष्ट हुआ हो, तो योनि और गर्भाशय दोनों की चिकित्सा होनी चाहिये ।
(१२) बलधर्मी—उसको कहते हैं कि जिसको निर्बलताके कारण गर्भ न रहता हो । ऐसी स्त्रियाँ बही होती हैं कि जो अत्यन्त मैथुनप्रिय हैं और जिनके शरीर में रक्त नहीं है । इनकी औषधि हो सकती है, परन्तु बहुत कठिनाई से ।
(१३) शकसयोगिता—उसको कहते हैं कि रजस्वला होने के पहले ही जिसका पुरुष से संयोग हो गया हो । ऐसी स्त्री का गर्भाशय दग्ध होकर सिकुड़ जाता है और फिर गर्भ नहीं रहता । इसी कारण सुधरने लिखा है कि