संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंवन्द्या रोग ।
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चिन्तामें व्याकुल हों, जो बूढ़े या बूढ़ी हों, जो रोगी हों, जिनको पाखाने पेशाबकी हाजत हो, जो रजवती और पुरुषसे उमरमें बड़ी, तपेदिक, स्वास प्रमेह, प्रदर, गरमी, सूजाक का रोगी हों, जिनके कामदेव न जगा हों, शृङ्गार-रहित, नशेवाज, उन्मत्त और अति दुर्बल हों, उनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
(३) जो अपनेको मिय न हो, जिसके देखनेसे चित्त बिगड़ जाय, जिससे अनवन रहें, विरक्त, जो गुरुके खानदानकी हो दुष्ट योनिवाली और वन्दचलन हो, इनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
इस प्रकारके स्त्री और पुरुषोंसे संयोग न होना चाहिये; क्योंकि इससे अनेक रोग उत्पन्न होकर हानि पहुँचाते हैं।
(१५) वन्द्या रोग ।
हमारे देशमें वन्द्याओंके लिये लोगोंका अनोखा विचार है। जहाँ चार छः वर्ष वच्चा न हुआ तुरन्त स्त्रीको वन्द्या मान बैठते हैं और भाग्य भगवान्के भरोसे पड़े रहकर कुछ यल नहीं करते वैद्यकमें जितनी वन्द्याओंका जिक्र किया गया है, उनमेंसे कुछ ही ऐसी हैं कि जिनके सन्तान नहीं हो सकती, किन्तु औषधि करनेपर वन्द्याएँ निरोग हो सकती हैं। प्रायः लोग यही समझते हैं कि वन्द्याएँ आठ प्रकार की होती हैं और यही बात प्रसिद्ध भी है, परन्तु और दूसरे ग्रन्थोंके देखनेसे पता चलता है कि वन्द्याएँ अठारह प्रकारकी होती हैं। इनकी व्याख्या पृथक् पृथक् की जाती है। [ रतिशात्र ]
(१) जन्मवन्द्या—उसको कहते हैं जो गर्भ ही धारण न कर सके। जाँच करनेपर मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके