भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

७२

सन्तति-शान्त ।

गर्भाशय ही नहीं होता । अतएव इसका इलाज नहीं हो सकता । क्योंकि इस रोग का सामान जन्म ही से रहता है । इस को पएडी भी कहते हैं ।

(२) काकवन्था—उसको कहते हैं कि जिसके एक ही सन्तान उत्पन्न होकर रह जाय, दूसरी न हो । जाँच करने पर यह मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंमें पहला बच्चा होनेके समय गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इस कारण दूसरी सन्तान नहीं होती । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।

(३) सूतवत्सा—उसको कहते हैं कि जिसके सन्तान उत्पन्न होती हो, परन्तु मर जाया करे । इस विषयमें धर्म-शास्त्रने यह माना है कि स्त्री पूर्व जन्मके पापोंसे सूतवत्सा होती है । यह बात गीता और वेदान्त-शास्त्रसे सिद्ध है कि मनुष्यको पूर्वजन्मका कर्म इस जन्ममें अवश्य भोगना पड़ता है । परन्तु इस विषयमें डाक्टोंका मत यह है कि जिस स्त्रीके बच्चे वारंवार मर जाते हैं, उसके दूध में एक प्रकारका विष होता है । मेरे एक मित्रके तीन बच्चे मर गए । चौथेको पैदा होते ही गायका दूध दिया गया, वह जिन्दा है; परन्तु पाचवाँ गायका दूध पिलाने पर भी मर गया । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।

(४) गर्भध्रावी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ धारण होकर गिर जाया करे । जाँच करनेसे मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशय के निकम्मे होनेसे होता है । यदि गर्भाशयमें थोड़ा विकार हो तो इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु रोग अधिक होनेपर औषधि भी व्यर्थ होती है । धर्म-शास्त्रने इस रोगको भी पूर्व जन्मके पापोंका फल माना है ।