संतति शास्त्र

संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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रजो-धर्मके रोग ।
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- ५. फेफड़े और गुरदेके अनेक रोगोंसे ।
- ६. सरीरमें खून कम हो जानेसे ।
- ७. शरीर दुर्बल और निर्वल होकर पीला पड़ जानेसे ।
- ८. तपेदिक और सोमरोगसे ।
- ९. प्रदर और उसके अनेक उपद्रवोंसे ।
- १०. आमाशयके अनेक रोगोंसे ।
- ११. शरीर का खून गाढ़ा होनेसे ।
- १२. रजसे संबंध रखनेवाले अवयवोंके विकारसे ।
- १३. भग मोटी होनेसे और उसके मार्ग रुद्धचित्त पड़ जाने तथा रगोंके द्रव जानेसे ।
- १४. अधिक बैठने और आराम करनेसे ।
- १५. बहुत चड़ा दुःख पहुँचनेसे कि जिसका आघात हृदय पर हो ।
- १६. दिमागी काम करने और अति मंथनसे ।
इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।
- १. पेट्का उभार जब कि रज इकट्ठा होकर न निकले ।
- २. हाथ, पाँव, पैर, कमर, नाभिमें दर्द और जलन उत्पन्न होना ।
- ३. रोग चढ़नेपर सारे पेटमें फोड़ेके समान दर्द ।
- ४. कुपत्त, सरदर्द, और घुमनी तथा आँखोंकी जलन ।
- ५. अण्डोंके दवानेपर दर्द होना ।
- ६. रगोंमें नीलापन ।
- ७. शरीरमें अत्यन्त सुस्ती ।
- ८. पेशाबकी अधिकता ।
- ९. शरीर भारी हो जाता है ।
- १०. पेट्को कड़ाई और रजसावके समयमें अत्यन्त पीड़ा ।
इस रोगमें सबसे पहले अण्डोंपर असर होता है । इसके