भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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पृष्ठ 74

रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।

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(१०) रजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।

निरोग स्त्रियों में नियम के अनुसार रज हर महीने अरुंडोत्पादक कोष से होकर जलोत्पादक कोष में पहुंचता है और अरुंडाधार से बाहर होकर डिम्बकोष से गर्भाशय में आता है। ऐसे समय में गर्भाशय की भिल्ली मोटी पड़जाती है। इसकी धमनियों में खून अधिक जम जाता है। बलगमी या श्लैष्मिक गांठे (Mucous glands) बढ़जाती हैं। पतली धमनियों (Capillaries) और पतले सिरों से खून निकलने के कारण कहीं कहीं धमनियों फट जाती हैं। बलगम अधिक बनने लगता है और खून के साथ बाहर आता है। इसी को रजोधर्म कहते हैं। इस विषय में लोगों ने यही मान लिया है कि कन्यायें गरम देशों में गरमी के कारण जल्द और सर्द देशों में सर्दी के कारण देरसे रजस्वला होती हैं, परन्तु यह सिर्फ मान ही लेने की बात है। किसी भी देश की कन्याओं को देखिए, उनके रजस्वला होने का समय एक न मिलेगा। देशको जाने दीजिये एकही शहर को लीजिये जहाँ की सरदी गरमी वहाँ की रहने वाली कन्याओं को बराबर मिलती है वहाँ भी कन्याएँ एक समय में रजस्वला नहीं होतीं सर्द या गरम देशको किसी घर में एक ही माता पिता की दो कन्याओं को—जिनका पालन एक ही ढंग पर हुआ है—देखिए वे भी एक समय में रजवती नहीं होतीं इस से स्पष्ट है कि रजस्वला होने का समय देश की गरमी और सरदी पर निर्भर नहीं है ॥

जगत् प्रसिद्ध डाक्टर हालिक (Halliek) की राय है कि संसार की सब जातियों में कन्याएँ लगभग एक ही उमर में रजस्वला होती हैं यदि आफिका जैसे गरम देशकी