संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 302 में से
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२०. गर्भाशयका मुख अधिक खुल जानेसे ।
१. इस रोगमें वीर्य अंदर पहुंचकर फिर निकल आता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२१. गर्भाशयके मस्तीसे ।
१. ऐसे मस्ते गर्भाशयके अंदर होते हैं, अतएव विकार उत्पन्न होनेसे गर्भ नहीं रहता ।
२२. गर्भाशयके दग्ध हो जानेसे ।
१. थोड़ी अवस्थामें पुरुष-प्रसंग होनेसे गर्भाशय दग्ध होकर अनेक विकार उत्पन्न करता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२३. गर्भाशयमें रक्त जमकर सूख जानेसे ।
१. गर्भाशयका मुख सकरा होनेके कारण रक्त जम जाता है, अतएव विकार उत्पन्न होनेसे गर्भ नहीं रहता ।
२४. गर्भाशयमें वीर्य न उठनेसे ।
१. गर्भाशयके अंदर चरबी बढ़ जानेसे चिकनाईके कारण वीर्य बाहर निकल आता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
२५. गर्भाशयमें मांस बढ़ जानेसे ।
१. इस रोगमें गर्भाशयके अंदर मांस घट्ट जाता है और बढ़बूदार रज निकलता है, अतएव इस विगाड़से गर्भ नहीं रहता ।
२६. गर्भाशयमें कीड़े पड़ जानेसे ।
१. इस रोगमें एक प्रकारके कीड़े गर्भाशयमें पड़ जाते हैं, और पतला बढ़बूदार स्तन हुआ करता है, अतएव गर्भ नहीं रहता ।
६. रजोधर्मके अनेक रोगोंसे ।
(इस विषयमें इसी पुस्तकका 'रजोधर्मके रोग' नामक प्रकरण देखो) ।