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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

२ वैचकका मत

१. रजस्वला होनेके दिनसे सोलह रात्रियोंमें पहिलेकी तीन और एक तेरहवीं रात्रि कुल चार रात्रि निर्दिष्ट हैं। बारह रात्रि उत्तम हैं।

(सु० श० अ० २ श्लो० ३१ और अ० ३ श्लो० ५)

२. रजोदर्शनके तीन दिन पीछे जब रज न निकले, तो तेरह दिन गर्भाधान योग्य हैं। (शु० श० अ० २ श्लो० २)

३. सोलह दिनोंमें पहिलकी चार रात्रियोंको छोड़कर बारह रात्रियां गर्भाधान करते योग्य हैं। (श० ६०)

अब धर्मशास्त्र और वैचकमें कई मत भेद हैं। मनुमहाराजि पहिलकी चार रात्रियां, ब्यारहवीं और तेरहवीं छोड़कर इस रात्रि उत्तम मानते हैं, परंतु याज्ञवल्क्य और व्यास केवल चार रात्रि निकाल कर बारह उत्तम मानते हैं। इसी प्रकार वैचकमें सुश्रुत महाराज आदिकी तीन और तेरहवीं निर्दिष्ट मानकर बारह रात्रि शुभ और गर्भाधान योग्य मानते हैं। महात्मा चरकके मतसे जब रज न निकले उसके बाद सव रात्रियां उत्तम हैं। इसी प्रकार शरीर-कल्पद्रुमके लेखक भेडाचार्य आरुम्मकी चार रात्रियां छोड़कर बारह रात्रि उत्तम मानते हैं। अतएव इन भेदोंका निर्णय होना ज़रूरी है।

२. आदिकी चार रात्रियां क्यों वर्णित हैं ?

इसके अनेक कारण हैं।

१. पहली रात्रि—वैचकका मत

१. रजस्वला होनेके पहले दिन संयोग करनेसे पुरुषकी उमर कम होती है और यदि गर्भाधान हो भी जाय तो जन्म होते ही बालककी मृत्यु होती है।

(सु० श० अ० २ श्लो० २२)