संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 302 में से
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सन्तति-शास्त्र ।
५. चारों राजियोंके मयोंगपर विचार—वैधक कामतं ।
१. तीन राजियों में रजवती स्त्री से संयोग करने से अनेक प्रकारके रोग हो जाते हैं । जैसे, कुण्ड गरमी, भ्रूचक्रुच्छ, रक्त-विकार और चौथी रात्रि में गमन करने से गर्भाशय को बहुत बड़ी हानि पहुँचती है । कारण यह है कि रज निकलने से उसमें कुछ परिवर्तन हो जाता है । अतएव संयोग की रपाड से हानि पहुँचती है । (रतिशास्त्र )
२. जब तक रज निकलता है, उस समयतक गमन करने-से पुरुषके वीर्य का नाश हो जाता है । (श० क०)
२. धर्मशास्त्रका मत
१. रजवती स्त्री के साथ गमन करने से पुरुष की बुद्धि, तेज, बल नेत्र की ज्योति और उमर घट जाती है ।
(मनु० अ० ४० श्लो० ४१)
२. रजस्वला होने पर आरम्भ की चार राजियों में गमन न करना चाहिये, क्यों कि इनमें स्त्री पुरुष दोनों को रोग उत्पन्न हो सकता है । (१० मनु०)
३. चौथी रात्रिमें गमन करने से थोड़े दिनों जीने वाला और दण्डित पुत्र उत्पन्न होता है । (नि० सिद्ध०)
अद्युत समय में जब कि चार दिन रज निकलता है या चौथे दिन जब कि रज न निकलता हो, संयोग करना चाहिये या नहीं ? पहलेके तीन दिन में संयोग या गर्भाधानके लिये तो सर्वसम्पति है—कि न करना चाहिये । परन्तु चौथे दिनके ावपय में मतभेद है वैधकके आचार्य लोग दोनों बात मानते हैं । धर्मशास्त्र में भी दोनों बातें मानी हैं । क्यों कि मनुने रजवती के गमनसे पुरुषकी बुद्धि इत्यादिका ह्रास माना है । केवल रजवती कहने से यह पता नहीं चलता कि तीन दिनके लिये