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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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गर्भाधानका समय ।

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कहा गया है या चार दिनके लिये । इससे तो यही मालूम होता है कि जबतक रज निकला करे तबतक संयोग न करना चाहिये ।

चौथे दिन संयोगके लिये सुश्रुतकी भी आज्ञा है, परन्तु चरकने यह नहीं माना है । इनका मत है कि जब रज न निकलता हो तो चौथे दिन संयोग करे ।

शरीर कल्पद्रुम ( वैद्यक ) के मतसे चौथे दिन संयोग न करना चाहिये, क्योंकि इस दिनके संयोग से स्त्रीको रोग उत्पन्न होता है ।

धर्मशास्त्र ( वृ० मनु० ) से भी ऐसा ही मालूम होता है और निर्णय-सिन्धुका मत भी है कि चौथे दिन गर्भाधान होने से अल्पायु और दरिद्र सन्तान उत्पन्न होती है । इसलिये यह विचार निश्चय किया गया कि अल्पायु और दरिद्र सन्तानको लेकर ही मनुष्य क्या करेगा, जिसके उत्पन्न होनेसे स्त्रीको भी रोगी बनना पड़े । अतएव चौथे दिन संयोग न करना चाहिये यही सार सम्मति है ?

४. ग्यारहवीं रात्रि क्यों वर्जित है ?

इसमें अनेक मत हैं ।

१ धर्मशास्त्रका मत ।

१. मनुने इस बातको कहा है कि ग्यारहवीं रात्रिमें गर्भाधान न करना चाहिये, परन्तु कोई कारण नहीं बताया । दूसरे ग्रन्थोंसे पता चलता है कि—

ग्यारहवें दिनके गर्भाधानसे धर्महीन कन्या उत्पन्न होती है ( नि० सिन्धु )

है ।