संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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नहीं मानते थे और न छोटी अवस्थामें ललनाओंके विलास- प्रेमी थे । इनके हृदयोंमें रजवीर्य और स्त्रीके अवयवोंके पुष्ट होनेका सदैव विचार रहता था । वे विषयके लिये नित्य लाला- पित नहीं रहते थे । इनको अपने ब्रह्मचर्यका हर समय विचार रहता था । वे अपना अमूल्य जीवन पशुओंकी भांति व्यतीत नहीं करते थे । कन्या और पुत्र पैदा करना इनके हार्थोंमें था । माताएँ आहार, आचरण, चेषा, व्यवहार, इच्छा, प्रेम और मनशक्तिसे उत्तम सुयोग्य बलवान और मनचाही सन्तान उत्पन्न करती थीं । इस समय अधिकांश मनुष्योंका यह विचार हो रहा है कि मनचाही सन्तान पैदा करना माता पिताके हाथमें नहीं हैं । यह एक बहुत बड़ा अंध-विश्वास है । जय हम अपने पूर्वजोंकी बातोंको पढ़ते हैं तो, क्या हमें लज्जा नहीं आती ? क्या अपनी अयोगतिके लिये नीचा नहीं देखना पड़ता ? हम उन पूर्वजोंकी सन्तान होनेका अभिमान रखते हैं कि जिनमें मनचाही सन्तान उत्पन्न करनेकी शक्ति थी । सहस्रों प्रमाण इस बातके उपस्थित हैं । युधिष्ठिरकी माताने गर्भावस्थामें युधि- ष्ठिरको न्यायशाली बनानेके लिये धर्मशास्त्र पढ़ा था, इसी कारण युधिष्ठिर न्यायशाली और धर्मात्मा हुए । अभिमन्यु माताके गर्भमें पिताके उपदेशसे चक्रव्यूहके पाँच फाटककी लड़ाईका हाल सुन कर मर्म्भ हो गए थे, परन्तु माताके सो जानेसे आगेका हाल न सुन सके । परशुराम जिस समय गर्भमें थे तो उनकी माता रेणुका-देवीने परशुरामको युद्ध वीर होनेके