भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

१. दिन, सन्ध्या और रात्रिपर विचार ।

१. प्रमोक्षसूत्रका नव ।

२. संन्यासे समय गर्भाधान या स्त्री-श्रतद्रु नही होना चाहिये । ( ३० पा० ॥ ३० २ श्लो० ६६ )

२. रात्रिका गर्भाधान उत्तम है । ( ज्ञान० ॥ २ श्लो० ३३ )

= वैदिकका मत ।

१. दिनों गमन करनेसे मनुष्यकी आयु, बुद्धि और आर्त्तिका ज्योति कम होती है । ( २० ॥ ३० )

२. दिनों गमन करनेसे सूर्यमुखी वातक उत्पन्न होनेका भय रहता है । ( रनिगात्र )

३. प्रातःकाल और आधी रातके समय संयोग करनेसे वायु ऊषित होती है । ( २० ॥ ३० )

४. गुणका नव ।

१. सायङ्कालके समय गमन करनेसे कल्प और आदिति ऐसे सुयोग्य मातापिताके होते हुए भी हिरण्यकशिपुका जन्म हुआ । ( नाव )

२. आधी रातके पश्चात् गमन करनेसे पुत्रका अनेक रोग उत्पन्न होने हैं । ( न० भा० )

इससे सिद्ध है कि दिनमें, सन्ध्याको और रात्रिमें आधी रातके बाद संयोग न करना चाहिये ।

इस विषयके पुरे विचारसे भातृम होता है कि रजस्वता होनेके दिनों चार रात्रि, न्यारहवीं और वेरहवीं रात्रिकों छोड़ कर दश रात्रि संयोग और गर्भाधान करने योग्य हैं । इन दश रात्रियोंमें पर्वतिथि, पर्वदिन, पर्वसमय, आद्वितीथि, दिन-सन्ध्या और आधी रातके बादका समय इत्यादि छोड़