भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४३

२. धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात कही जाती है कि रजस्वला होने से ६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रि में संयोग करने से पुत्र और ५-७-९-११-१३ और १५ रात्रिमें, गमन करने से कन्या उत्पन्न होती है। इन रात्रियों में रजकी दशा पर विचार करना आवश्यक है। इस विषयमें विदेहाचार्यने लिखा है कि ४-६-८-१०-१२-१४-१६ इन रात्रियोंमें रज बहुत ही कम और ५-७-९-१३-१५ इन रात्रियोंमें बहुत ज्यादा निकलता है। एक और विद्वान् की राय है कि ४-६-८-१०-१२-१४-१६ इन रात्रियोंमें स्त्रीको रज कम निकलता है और इससे पुत्र उत्पन्न होता है। यदि इन रात्रियों में वार्ध अंगसे रज निकले तो वह किसी योग्य नहीं होता। इसी प्रकार ५-७-९-११-१३-१५ इन रात्रियोंमें स्त्रीके रज अधिक निकलता है और उससे कन्या उत्पन्न होती है। यदि इन रात्रियोंमें रज दहिने अंगसे निकले तो वह भी किसी योग्य नहीं होता। (रतिशाम्भ)

इन प्रमाणों से यह बात सिद्ध हुई कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियों में स्त्रीके दहिने अंगसे निकला रज पुत्र और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें वार्ध अंगसे निकला रज कन्या उत्पन्न करता है। यदि इसके विपरीत ४-६-८ इत्यादि रात्रियोंमें वार्ध अंग से और ५-७-९ इत्यादि रात्रियोंमें दहिने अंगसे निकला रज किसी योग्य नहीं होता, तो इससे यह बात सिद्ध होती है कि जब सम रात्रियोंमें रज स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकल कर पुरुषके दहिने अंगसे निकले वीर्यसे मिलेगा तो पुत्र और जब स्त्रीके वार्ध अङ्गसे विषम दिनोंमें निकल कर पुरुषके वार्ध अंगसे निकले हुए वीर्यसे मिलेगा तो कन्या होगी। यह