संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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सन्धति-शास्त्र ।
सिद्धान्त हमारे माते हुए मतसे जुदा नहीं है। इसलिये हमारी मानी हुई बात और यह सिद्धान्त एक ही है।
२. धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात कही जाती है कि जब वीर्य अधिक हो और रज कम हो, तो पुत्र, यदि रज अधिक हो तथा वीर्य कम हो, तो कन्या उत्पन्न होती है। इस विषयमें यह देखना है कि रज और वीर्य अधिक कब निकलता है। नम्बर २ में विदेशाचार्यका मत लिखा गया है कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियोंमें रज कम और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें अधिक निकलता है। एक विद्वान्की राय है कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियोंमें कम निकले हुए रजसे पुत्र और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें निकले हुए अधिक रजसे कन्या उत्पन्न होती है। यदि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियों में स्त्रीके वार्प अंगसे रज निकले या ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें दाहिने अंगसे निकले, तो दोनों अयोन्म्य होते हैं।
(रतिशास्त्र)
जब इस प्रकार ४-६-८ आदि सम रात्रियों में रज स्त्रीके दाहिने अंग से कम निकलकर पुरुषके दाहिने अंग से निकले हुए अधिक वीर्यके साथ मिलेगा, तो पुत्र होगा। इसी प्रकार जब ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियों में रज स्त्रीके वार्प अंगसे अधिक निकल कर पुरुष के वार्प अङ्गसे निकले हुए कम वीर्य के साथ मिलेगा, तो कन्या होगी। इसमें यह बात है कि जब स्त्रीका रज कम होगा तो पुरुषका वीर्य अधिक होगा। कारण स्त्रीका रज अधिक होगा तो पुरुषका वीर्य कम होगा। यह कि पुरुषका प्रधान अङ्ग दाहिना है, इसलिये दाहिने से अधिक और वार्प से कम वीर्य निकलता है। इसी प्रकार स्त्री-