भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अर्थाह है। १४५

के प्रधान वार्ध अंगसे अधिक और दहिने अंगसे कम रज निकलता है। अतएव पुरुषके दहिने अंगसे निकला हुआ अधिक वीर्य स्त्रीके वार्ध अंगसे निकले हुए कम रजके साथ मिलकर पुत्र और स्त्रीके दहिने अंगसे निकला अधिक रज पुरुषके वार्ध अंगसे निकला कम वीर्यके साथ मिलकर कन्या उत्पन्न करता है। इस कारण यह सिद्धान्त हमारे विरुद्ध नहीं, क्योंकि हमारी मानी हुई बात और यह सिद्धान्त एक ही है।

४. वैद्यक, हिन्दुओंका प्राचीन मत, यूनानी मत, यूरोपीय

विद्वानोंकी राय, यूरोपीय विद्वानोंकी जाँच-पशुओं और मनुष्यों पर अनुभव करनेसे और मित्रों द्वारा जो बातें मालूम हुई उससे यह कहा जाता है कि स्त्री-पुरुष के दहिने अंगसे पुत्र और वार्धसे कन्या उत्पन्न होती है। इस विषयका खुलासा यह है कि पुरुषके दहिने अण्डमें पुत्र और वार्धमें कन्याका वीर्य रहता है।

इसी प्रकार स्त्रीके दहिने अण्डमें पुत्र और वार्धमें कन्याका रज रहता है। इसलिये जब पुरुषके दहिने अण्डसे वीर्य निकलकर स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजसे मिलता है, तो पुत्र और जब स्त्रीके वार्ध अण्डसे निकला रज पुरुषके वार्ध अण्डसे निकले वीर्यसे मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है। यहाँ पर पाठक यह शङ्का करेंगे कि पुरुषके दहिने और स्त्रीके वार्ध या स्त्रीके दहिने और पुरुषके वार्ध अण्डोंसे निकले रज-वीर्यसे क्या होता है? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि दहिनेका वार्ध और वार्धका दहिने अण्डसे निकला रज वीर्य मिलता ही नहीं। (रतिशास्त्र)

५. वैद्यकके मतसे यह कहा जाता है समीरण, चन्द्रमसी

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