भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

और गौरीमें वीर्य गिरनेसे कन्या और पुत्र उत्पन्न होते हैं । भावमिश्र जहाँ इस प्रकारणको अपने ग्रन्थ भाव-प्रकाशमें लिखते हैं, वहाँ यों लिखा है कि “ स्त्रियों के काम मन्दिरके मुखमें समीरणा, चन्द्रमसी और गौरी तीन नाडियाँ होती हैं । काममन्दिर क्या है ? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि काममन्दिर गर्भाशयको कहते हैं । (रतिशास्त्र )

अब यह सिद्ध हुआ कि गर्भाशयके मुखमें तीन नाडियाँ होती हैं । इतमें समीरणा वह भाग है जो गर्भाशयके मुखके बीचमें होता है । इस स्थानपर वीर्य गिरनेसे बाहर निकल आता है । चन्द्रमसी गर्भाशयकी बाई ओर है । इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके वार्प अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है । इस मार्गसे गया हुआ वीर्य कन्या उत्पन्न करता है । इसी प्रकार गौरी गर्भाशयके दहिनी ओर है, इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके दहिने अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है, इस मार्गसे गया हुआ वीर्य पुत्र उत्पन्न करता है । गर्भाशयके दहिने वार्प दो अण्ड होते हैं । इन्हीं अण्डोंसे गर्भाशयमें रज पहुँचता है । इधरसे चन्द्रमसी रास्तेसे बाई ओर होकर वीर्य पहुँचता है और वार्प अण्डके निकले रजसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है । जब वीर्य गर्भाशयके दहिने ओर गौरीके रास्तेमें पहुँचता है तब दहिने अण्डके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है । अतएव यह सिद्धान्त हमारे माने हुए मतसे पूरा पूरा मिलता है ।

६. एक डाकूका मन है कि शत्रुदर्शनमें ७-८-१० दिन बाद सयोग करनेसे पुत्र और ज्ञान करके दूसरे तीसरे दिनोंके गर्भ पड़नेसे कन्या उत्पन्न होती है । इसका कारण