संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 302 में से
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स्थानपर ठीक रीतिसे रहते हैं । किसी प्रकारका विनाङ्ग उत्पन्न नहीं होता । ( ३० अ० अ० ८ श्लो० ७ से ८ )
(२) बड़े होकर संयोग करनेसे शुक्राश्रमी रोग हो जाता है । ( भा० प्र० )
(३) सिवाय चित्त होकर संयोग करनेके जितने तरह से किया जाता है, सबमें वात पित्त और कफ उत्पन्न होकर वाधा पहुँचती है । ( अ० क० )
शरीरका संचालन एकमात्र वात, पित्त और कफसे ही होता है । इनमेंसे यदि एक भी विनाङ्ग जाय तो शरीरका दर्जा किनी तरह नहीं चल सकता । ऐसी अनुचित क्रियाओंसे सहज हीमें अनेकों रोग खड़े हो जाने हैं जिनसे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । अतएव सर्वसम्भूतिये यही निश्चय होता है कि स्त्रीको चित्त होकर संयोग करना अति उत्तम है और किसी दूसरी रीतिसे कभी संयोग न होना चाहिये ।
(२६) गर्भ कैसे रहता है ?
रज और वीर्य ही गर्भके कारण हैं। रजस्वला होनेसे सौलह दिनतक गर्भाशयका मुत्र खुला रहता है । यही गर्भ-धारण होनेका समय है । ( रतिगान्ध )
संयोग समयमें सहवासकी गरमीसे वीर्य पतला होकर वायुसे लिंग द्वारा गर्भाशयकी गरदनपर, जो सुराहीदार योनिके सिरेसे गर्भाशयतक होती है, पहुँचता है और रजसे मिलकर गर्भ बनाता है । इस विषयमें कड़े मत हैं ।
१; ढाकटोंका मत ।
१. इसके अनुसार यह माना गया है कि आगेकी ओरसे वीर्यके साथ जो कोई उसमें होते हैं, गर्भाशयकी