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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

दूसरेके चित्तको अपनी और खाँचने के लिए २७ गारकी जहरत है । (रतिशास्त्र)

कैसी ही कुरुपा स्त्री क्यों न हो, २७ गारयुक्ता होनेपर वह भली मालूम होती है । इसी प्रकार रूपवती विना २७ गारके अपना विकास नहीं फैला सकती । इसका तात्पर्य यह है कि २७ गार एकमात्र चित्त वशीभूत करके कामोद्दीपन करता और संयोग शक्तिको बढ़ाता है । (रतिशास्त्र)

पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी २७ गारयुक्त पुरुषको देख कर मोहित हो जाती हैं । अतएव दोनोंका २७ गार गर्भाधानके समय जरूरी है ।

कितने शोककी बात है कि आज हम अपने नये जवानों-को प्रकृतिके विरुद्ध सीधे रास्ते को छोड़ कर निकम्मे मार्गका अवलम्ब करते हुए देखते हैं ।

लोग यह समझते हैं कि चाहे जिस प्रकारसे संयोग करलें किसी प्रकारसे बाधा नहीं है, क्यों किहर तरहके संयोग ही से सन्तान तो होती ही है । यदि ऐसा न होता तो कोकशास्त्र से चौरासी प्रकारके आसनों का विधान क्यों किया जाता ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि—

१. कुबडी होकर संयोग करानेसे वायु प्रवल होकर योनि बाधा को प्रकट करती है । यदि दहिने करवट होकर संयोग हो, तो कफ गिर कर गर्भाशयको ढक लेता है । बाईं करवट होकर संयोग होने से पित्त गर्भके रक्त और धीर्य को नष्ट कर देता है । इस कारण चित्त करके संयोग करना उत्तम है, क्यों कि चित्त होकर संयोग करने से बात, पित्त और कफ सब अपने अपने

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