संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंयोग-विधि ।
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दोनों स्त्री और पुरुष का वार्या अरुड ऊपरको चढ़ जायगा और उसीसे रज वीर्य निकलकर स्त्रीके बाएँ अरुडसे निकला रज पुरुषके बाएँ अरुडके निकले वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करेगा परन्तु यह विचार रहे कि यह क्रिया पुत्र के लिये रजो रजोधर्म से ४-६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रि और कन्याके लिये रजोधर्मसे ५-७-९-११-१३ और १५वीं रात्रिसँ कीजावे । इन क्रियाओंसे हम अपनी इच्छाके अनुसार मन चाही कन्या और पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु यह तभी भला जब स्त्री पुरुष दोनोंमें अरुडे अच्छी तरह हों और किसी प्रकार का रोग न हो ।
गर्भाशय और योनि विकारयुक्त न हो, पुरुषोंमें वीर्य दोष इत्यादि न हो, ऐसा होने पर इसी रीतिके अनुसार कन्या और पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आश्रीन है ।
( २८ ) संयोग-विधि
स्त्री और पुरुषके संयोग होनेपर ही गर्भाधान हो जाता है लोग इसको बहुत मामूली बात समझते हैं, पर यह बहुत बड़े गौरव का विषय है । इस काम में स्त्री और पुरुषों की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है, पर वे जरा भी विचार नहीं करते । यह कार्य बड़ी प्रसन्नता और उत्साहके साथ होना चाहिये । परन्तु यह उसी समय हो सकता है जब कि दोनोंमें प्रेम हो । प्रेमका प्रवाह जिन स्त्री-पुरुषोंमें अथाह होकर बहता है, वेही योग्य सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं ।
दोनोंका शृंगार भी जरूरी है । जिस प्रकार हवन करनेके लिये शीकी जरूरत होती है उसी प्रकार गर्भाधानमें एक