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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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जीव गर्भमे कब आता है ?

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२. धर्मशास्त्रका मत ।

१. स्त्री और पुरुषके संयोगसे पुरुषका शुद्ध वीर्य योनिमें जाकर स्त्रीके शुद्ध रजसे मिलता है। उसी समय भूतात्मा, आप ही आकाश वायु जल पृथिवी और अग्नि अर्थात् पंच महाभूतोंके साथ गर्भाशयमें स्थित होता है ।

( या० य० ध० प्र० ७२ )

३. वैद्यकका मत ।

१. जब गर्भाशयमें रज-वीर्य और जीव इन तीनोंका संयोग ( मेल ) हो जाता है, तो उसको गर्भ कहते हैं; अर्थात् रज-वीर्य और जीव इनके मिलनेपर ही गर्भ स्थित होता है । ( च० श० अ० ४ श्लो० ३ )

२. जिस समय गर्भाशयमें रजवीर्यका मिश्रण होता है । उसी समय जीव उनके साथ उसमें प्रवेश करता है । जिस प्रकार सूर्यकी किरण और मणिके संयोगसे अग्नि प्रकट होती है, इसी प्रकार रज-वीर्यके मिलनेसे जीव प्रगट होता है । ( भा० प्र० ग० प्र० ३२ ३३ )

६. डाक्टरोंका मत ।

१. रज-वीर्यके कीड़े आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं, बिना इन जीवोंके मिले गर्भ नहीं रहता अर्थात् प्रारम्भसे ही गर्भ सजीव होता है ।

धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात मालूम होती है कि जब गर्भाशयमें रज-वीर्य मिलता है उस समय उनमें जीव आ जाता है । वेदसे भी यही स्पष्ट है कि गर्भ प्रारम्भ से ही सजीव होता है । डाकुरी मतका भी अभिप्राय यही है कि गर्भ सजीव स्थित होता है । अतएव सर्वसम्मतसे यह बात निश्चय है कि

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