संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६
सन्ततिशास्त्र ।
रज-चीर्थ्य मिलते ही जीवका संयोग मिले हुए पदार्थमें हो जाता है या यों कहो कि गर्भ सजीव ही स्थित होता है ।
(३२) प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
प्रेम ईश्वरका दिया हुआ एक उत्तम पदार्थ है । संसारी जीव प्रेमके फन्देमें फंसे दिखलाई पड़ते हैं, कारण यह है कि ईश्वरकी स्मृतिही प्रेममय है । अतएव विना प्रेमके निवाँह होता कठिन है । प्रेम मनसे उत्पन्न होता है, इसलिये मनको जो वस्तु मिय होती है उसीसे प्रेम होता है । सारे सम्बन्ध प्रेमके सामने भूटे हैं । इसलिये प्रेमका सम्बन्ध सबसे बलिष्ठ है । हर एक मनुष्य हर एक बातसे प्रेम नहीं रखता । एक जिससे प्रेम रखता है दूसरा उसको बुरा बतलाता है । इसका कारण मन ही है । प्रेम दो तरफ़का होता है ।
(१) वह जो थोड़ी देर तक रहे । इसको 'चर' प्रेम कहते हैं ।
(२) वह जो बराबर बना रहता है और बढ़ता जाता है जिसको 'अखण्ड' या 'अटल' प्रेम कहते हैं । किसी वस्तु-को देखकर प्रसन्न हो जाना और फिर उसकी परवाह न रखना या उससे अच्छी वस्तु पाकर भूल जाना, ऐसे प्रेमका सम्बन्ध हृदयसे अधिक और मस्तकसे कम रहता है । इसीको चर प्रेम कहते हैं । अखण्ड या अटल प्रेम वह है जो सौते, जागते एक समान रहता है, कभी कम नहीं होता, किन्तु बढ़ता ही जाता है । अच्छीसे अच्छी वस्तु प्रेमीके हृदयसे प्रेमको अपनी ओर नहीं खींच सकती । ऐसे प्रेमका सम्बन्ध मस्तकसे अधिक और हृदयसे कम होता है । चर प्रेममें स्वार्थ होता है, परन्तु अटल प्रेममें स्वार्थ नहीं होता । जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ स्वार्थ कहाँ ? प्रेम भी एक प्रकारका नहीं होता । प्रेमके अनेक प्रकार