भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 205

१८४

सन्तति-शास्त्र ।

१६. यदि गर्भवतीका चित्त साबरके मांसपर हो, तो उद्भिन्न-चित्तवाली सन्तान होती है। (२०)

१७. तीतरका मांस खानेकी इच्छा यदि गर्भवती करे, तो सदा डरनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है। (२०)

१८. गर्भवती यदि शृंगारकी इच्छा करे, तो शौकीन सन्तान होती है। (श० क०)

१९. यदि गर्भवती को वदचलनीके लिये किसी मिष्ठसे मिलनेकी इच्छा हो, तो वदचलन पुत्र और यदि कन्या हो, तो वह कुकर्म करनेवाली होती है। (श० क०)

२०. किसी स्नेहीसे मिलनेकी इच्छा हो, तो मिलनसार सुहृद सन्तान होती है। (श० क०)

२१. यदि श्रेष्ठ और पूज्य जनोंसे मिलनेकी इच्छा हो, तो सदाचारी सन्तान होती है। (श० क०)

२२. यदि गर्भवतीको खेल करनेकी इच्छा हो, हँसमुख सन्तान होती है। (श० क०)

२३. शिफार करनेकी इच्छा यदि हो, तो हँसक सन्तान होती है। (श० क०)

२४. यदि गर्भवतीकी लिखने पढ़नेकी इच्छा हो, तो गुणस सन्तान होती है। (श० क०)

२५. यदि नाच-गानेकी इच्छा हो, तो शृंगाररससे भरी हुई सन्तान होती है। (श० क०)

२६. यदि गर्भवतीको उत्तम फल खानेकी इच्छा हो, तो शुद्ध भोजन करनेवाली सन्तान होती है। (श० क०)

२७. फुलवारी और उपवनोंमें सैर करनेकी इच्छा हो, तो प्रसन्नाचित्तवाली सन्तान उत्पन्न होती है। (श० क०)