संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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सन्तति-शास्त्र ।
४. मीठा भोजन खानेवाली गर्भवतीसे प्रमेह रोग वाली, गुरी या अत्यन्त मोटी सन्तान होती है । ( ३० )
५. गर्भवतीके खटाई खानेपर रक्त पित्तसे रोगी, कुष्ठि या नेत्र-रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३३ )
६. नमक अधिक खानेवाली गर्भवती बली, पलित और खलित्य रोगग्रस्त सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३२ )
७. यदि गर्भवती चरपर रसका अधिक सेवन करे, तो दुर्बल, थोडे वीर्य और उससे सन्तान न होनेवाला बालक उत्पन्न होता है । ( ३० )
८ कडुप रसके सेवन करनेवाली गर्भवतीसे शोपी, दुर्बल और सूखी हुई सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३२ )
९. यदि गर्भवती कसैले रसका सेवन किया करे, तो काले रंगवाली या श्रफरा या उदावत रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३२ )
१०. फीका भोज करनेसे निम्नज आलसी सन्तान होती है । ( रतिगन्त्र )
इस प्रकार विपरीत भोजनके होनेसे अनेक प्रकारके रोगों-से युक्त सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव माता को अपने भोजनपर विशेष ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि सन्तानके गुण-दोषमें आहार एक बहुत बड़ी चीज है । खाने हुए पदार्थसे रस बन कर गर्भका पोषण होता है । अतएव भोजनके गुण-दोषानुसार सन्तानके उत्पन्न होनेमें आश्चर्य ही क्या है ?
(३२) गर्भवतीके लक्षण ।
जिन स्त्रियोंमें रजोधर्मकी खराबी है, जो दो दो तीन तीन मासतक रजस्वला नहीं होतीं, उनको गर्भाधान होनेका पता