संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगर्भवतीके लक्षण ।
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ही नहीं चलता । वे इसी विचारमें रहती हैं कि अभी रजस्त्राव- का समय नहीं आया है । यदि गर्भावधान हो गया तो अनेक कारणोंसे विश्वास ही नहीं होता । क्योंकि वे ऐसे ही लक्षणों- को ठीक मानती हैं कि जो रुग्णावस्थामें भी पाये जाते हैं । इसलिये उन लक्षणोंको भी जानना जरूरी है कि जो गर्भवतीमें होते हैं । इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. वैद्यकका मत
१. स्तनोंके अगले भागका काला हो जाना, पेटपर वालोंकी सेली उठी सी दिखलाई देना, नंब्रोंकी पलकोंका विशेष रूपसे मिचना, बिना किसी दूसरे कारणके कै होना, सुगन्ध बुरी लगना, थूक अधिक आना, थकावट मालूम होना । (सु० ३० अ० ३७४० १३ वा १४ )
२. रज बन्द हो जाना, बार बार मुखमें पानी भर आना, अन्नसे अरुचि, कै, खटाई खानेकी इच्छा होना, शरीर- का भारी पड़ जाना, दोनों आखें मिचीसी जान पड़ना, स्तनोंमें दधका संचार होना, ओठ और स्तनोंका अगला भाग काला पड़ जाना, पैरों में थोड़ीसी सूजनका होना, कभी कभी रोमांच हो जाना । (च० ३० अ० २३४० २१ )
३. मैथुनकी चाह न होना, मुखका पीला पड़ जाना, स्तनों- का बढ़ना, न खाने योग्य वस्तुओंके खानेको चिन्त चाहना, बालकका उछलना, आलस्य, डकारोंका आना और अपच । (३० क० )
२. बिद्वानोंकी राय ।
१. गर्भमें बालकके हृदयकी धड़कन मालूम होती है । यह धड़कन घड़ीके समान हृदयपेशियोंके संकोचनसे होती