भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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शरीरका वर्ण ( रंग )

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से रहना चाहिये, जिससे वे ऐसे रोगोंसे बचे रहें, जो वंश परंपरासे बच्चोंमें आते हैं।

(५३) शरीर का वर्ण ( रंग )

इस बातमें प्रायः लोगोंको सन्देह होना है कि एक ही प्रान्तके रहने वालों और एकही माता-पिता से उत्पन्न सन्तानोंके रङ्गोंमें क्यों अन्तर पड़ता है ? इसके अनेक कारण हैं।

१. वैधकका मत।

१. तेज ( अग्नि ) धातुसे ही सब रंगके बालक उत्पन्न होते हैं। गर्भाधान समयमें यदि तेज धातु जल धातुके अधिकांशसे युक्त हो, तो गौर रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी धातुके अधिकांशसे युक्त हो तो काले रंगकी सन्तान होती है। यदि तेज धातु पृथ्वी और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो कालापन लिये साँवले रंगकी सन्तान होगी। यदि तेज धातु जल और आकाशके अधिकांशसे युक्त हो, तो गोरापन लिये साँवले रंगकों सन्तान होगी।

( सु० १० अ० २ श्लो० ३७ )

२. गर्भवती जैसे वर्णका आहार करे वैसे ही रंगकी सन्तान होती है। ( सु० १० अ० २ श्लो० ३८ )

३. गर्भाधान समयमें माताका चित्त जैसे रंग रूपवाले स्त्री-पुरुषपर पहुँचता है, उसीके अनुसार सन्तान होती है।

( रतिशास्त्र )

४. गर्भाधान समयमें जैसा रूप स्त्रीके सामने आ जाता है, वैसी ही सन्तान होती है। ( १० क० )