भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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मनोविज्ञान ।

इस समय इन विषयों का विचार उभरता है । पहला विचार यह है कि वेद वातु और दूसरी वातुओंसे मिलकर उनके रंगोंको सम्मान उत्पन्न करती है । यहाँ पर यह बात सुख है कि शरीरमें जो वातु अधिक होती वही वेद वातुसे मिलती है । इसी कारण एक ही गन्धसे कभी काली और कभी गंधा मन्त्राण पैदा होती है । इसीसे जैसे रंगोंको सम्मान पैदा होता है, उसी वातुओं और शरीरोंसे मानवियोंपर वृद्धि उत्पन्न होती है, जो मन्त्राण रंगोंको सम्मान पैदा हो सकते हैं ।

दूसरा विचार यह है कि गन्धवीज जैसे वृक्षोंका आहार संवत् करे वैसे ही सुगन्ध उत्पन्न होता है । यह ठीक है, परन्तु लोग यह समझते हैं कि गन्धके मन्त्रमें जो जैसे वृक्षोंका आहार करे वैसे ही सुगन्ध होता है । नहीं, इस जगह यह समझना है कि गन्धवीजों जैसा आहार माया हो अर्थात् गंध वृक्ष, होनेसे पहले मन्त्राण जैसे आहारका सेवन किया हो वैसे सम्मान होता है । इनका कारण यह है कि जैसा आहार माया जाता है उसीके अनुसार शरीरमें स्थित वातुओं की वृद्धि होती है । इसीसे जैसा मन्त्र या आहार वातुओं की वृद्धि होती है वही वातु वेद वातुसे मिल कर अपने रंगोंके अनुसार सम्मान उत्पन्न करती है । इसीसे जैसा रंगोंको सम्मान उत्पन्न करनेवाली वृक्षोंका आहार करती चाहिये ।

तीसरा विचार यह है कि जैसे गंध सुगन्धों और पुरुरा पर मायाका ध्यान होता उसीके अनुसार सम्मान होता है । ठीक है परन्तु इसमें बहुत गहरा विचार है । वैदिक का मत है कि जिस तरह ओकों पुलकके सूँवनेसे और पुलकको ओकों सूँवनेसे ही कन्दहरा हो जाता है, उसी तरह गन्धाधान सम्मान