भारतकोश
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

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सन्तति-शास्त्र ।

कारण है कि जो एक सा सारी स्त्रियाँका नहीं हो सकता । अतएव प्रत्येक मनुष्यकी आकृति भिन्न भिन्न होती है ।

( ५५ ) नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होना ।

जिस प्रकार मनुष्यका रूप रंग एकसा नहीं होता इसी प्रकार नेत्र भी एक प्रकारके नहीं होते । गर्भ जब चार महीनेका हो जाता है तब आँखोंमें कुछ ज्योति आने लगती है । इसलिये चौथे महीनेमें जैसा तेज दृष्टि-भाग में आता है वैसी ही आँखें होती हैं ।

वैयक्तिका मत ।

( सु० श० अ० २ ख० ० ९३ )

१ यदि गर्भके बालककी आँखोंमें तेज धातु न पहुँचे तो बालक जन्मसे ही अन्ध होता है ।

२ यदि तेज धातु रक्तके साथ होकर दृष्टि-भागमें जावे तो बालक लाल नेत्रोंवाला होता है ।

३ यदि तेज धातु पित्तके साथ होकर आँखोंमें पहुँचे तो बालक पीले नेत्रोंवाला होता है ।

४. यदि तेज धातु कफके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो सफेद नेत्रोंवाला बालक होता है ।

५ यदि तेज धातु वायुके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो मँडी आँखोंवाला या नेत्र रोग वाला या चंचलाक्ष बालक होता है ।

तेज धातुके साथ दूसरी धातुओंके मेलसे इस प्रकार वच्चों-की आँखें बनती हैं । यहाँपर एक बहुत बड़ा प्रश्न यह होता है कि तेज धातुके साथ वात पित्त इत्यादि किस प्रकार पहुँचते हैं । शरीरमें वात पित्त इत्यादिमें से जिसकी अधिकता